व्यवस्था की बेरुखी पर भारी पड़ी सामाजिक संवेदना, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से जूझते बच्चों के लिए संबल बना ‘जनचेतना’

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़/बेंगलुरु।
जब व्यवस्थाएं लाचार हो जाएं और सिस्टम की चौखट पर की गई गुहार फाइलों के ढेर में दब जाए, तब समाज की एकजुटता ही अंतिम उम्मीद बनती है। रायगढ़ जिले में दुर्लभ और गंभीर बीमारी ‘मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ से जूझ रहे दो मासूम बच्चों और उनके परिवारों के साथ भी यही हुआ। शासन-प्रशासन के दरवाजों पर कई महीनों तक भटकने के बाद जब कोई मदद नहीं मिली, तो सामाजिक संगठन ‘जनचेतना मंच’ आगे आया और जनसहयोग के माध्यम से इन मासूमों के इलाज की राह आसान की।
मासूमियत पर लाइलाज बीमारी का साया
रायगढ़ शहर के केलो बिहार निवासी हेमंत हंसराज के पुत्र ऋषभ हंसराज और ग्राम सूपा (पुसौर) निवासी श्यामलाल अहिरवार के पुत्र सालोम अहिरवार मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित हैं।
लक्षण और जटिलता: डॉक्टरों के अनुसार, इस बीमारी में बच्चे 2-3 वर्ष की उम्र में पंजे के बल बैठने लगते हैं और एड़ी पर संतुलन नहीं बना पाते। उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर का निचला हिस्सा निष्क्रिय होने लगता है, चाल में लंगड़ाहट आती है और अंततः 10 वर्ष की आयु के बाद बच्चा व्हीलचेयर पर आ जाता है।

इलाज की चुनौती: मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का उपचार अत्यंत महंगा और जटिल है, जो सामान्य मध्यमवर्गीय या ग्रामीण परिवारों की आर्थिक क्षमता से कोसों दूर है।
प्रशासनिक उपेक्षा और जनसहयोग की पहल
पीड़ित बच्चों के परिजनों ने पिछले कई वर्षों से लगातार शासन और स्वास्थ्य विभाग के चक्कर काटे, लेकिन सरकारी स्तर पर केवल आश्वासनों का पुलिंदा ही हाथ लगा। जब उम्मीदें टूटने लगीं, तब परिजनों ने सामाजिक संस्था ‘जनचेतना मंच’ से संपर्क किया।
सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी और मंच के सदस्यों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कदम बढ़ाया। सरकारी सहायता का इंतजार करने के बजाय, संगठन ने जनसहयोग (Crowdfunding) के जरिए धनराशि जुटानी शुरू की। दोनों बच्चों को बेंगलुरु के प्रसिद्ध अस्पताल ले जाया गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज और परामर्श प्रक्रिया शुरू कराई गई है।
जनचेतना मंच: जनसेवा और संघर्ष का पुराना इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब जनचेतना मंच किसी गंभीर आपदा या बीमारी में ढाल बनकर खड़ा हुआ हो। संगठन का इतिहास जनहित के मुद्दों पर लगातार काम करने का रहा है:
छायांक नायक का मामला: इससे पूर्व स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) से पीड़ित ग्राम तुरंगा (पुसौर) के छायांक नायक (पिता नरेंद्र नायक) के लिए 16 करोड़ रुपये के भारी-भरकम इलाज हेतु मुंबई के नानावटी अस्पताल में प्रयास किया गया था, जिससे वह बच्चा आज स्वस्थ है।
सिलिकोसिस पीड़ितों के लिए संघर्ष: 2015 में डॉ. मुरलीधरण के सहयोग से तमनार के सराईपाली में कैंप लगाकर सिलिकोसिस प्रभावित 24 मरीजों को चिह्नित किया गया, जिनका इलाज रायगढ़ मेडिकल कॉलेज और रायपुर में कराया गया। साथ ही मृतक परिवारों को सरकार से 3-3 लाख रुपये का मुआवजा दिलाया गया।
बहुआयामी सामाजिक कार्य: पद्मनाभ प्रधान, सविता रथ, राजेश गुप्ता, शिव पटेल, भोजमती राटिया जैसे कार्यकर्ता स्वास्थ्य, शिक्षा, वन अधिकार, सूचना का अधिकार (RTI) और ग्राम सभा सशक्तिकरण के मुद्दों पर सतत सक्रिय हैं।
अन्य राज्यों से सीख और नीतिगत बदलाव की मांग
इस मानवीय त्रासदी के बीच परिजनों और जनचेतना मंच ने छत्तीसगढ़ सरकार से अन्य राज्यों की तर्ज पर ठोस नीति बनाने की मांग की है:
ओडिशा मॉडल: ओडिशा सरकार मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए कानून बनाकर 5 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
राजस्थान मॉडल: राजस्थान में इस बीमारी की दवाइयां और संबंधित स्वास्थ्य खर्च पूर्णतः निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं।
बड़ा सवाल:
क्या छत्तीसगढ़ में भी ऐसे गंभीर और दुर्लभ रोगों से पीड़ित बच्चों के लिए कोई स्थायी स्वास्थ्य नीति या विशेष कोष बनेगा, या फिर हर बार मासूमों की जिंदगी केवल सामाजिक सहयोग और चंदे के भरोसे ही टिकी रहेगी?
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