“सीएसआर का खेल: कभी 27 करोड़, कभी 15 करोड़… रायगढ़ में कंपनियों की ‘मर्जी’ से तय हो रहा सामाजिक विकास”

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) का मूल उद्देश्य उद्योगों के मुनाफे का एक हिस्सा समाज के विकास में लगाना है, लेकिन रायगढ़ जिले में यह व्यवस्था धीरे-धीरे अपने मकसद से भटकती नजर आ रही है। यहां सीएसआर अब कानून से ज्यादा कंपनियों की “इच्छाशक्ति” पर निर्भर हो गया है। आंकड़े बताते हैं कि कभी करोड़ों की राशि एकत्र होती है, तो कभी उसी जिले में बेहद कम रकम पर संतोष कर लिया जाता है।
सरकारी अभिलेखों और विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के बीच भी भारी अंतर सामने आ रहा है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आंकड़ों का खेल: हर साल अलग कहानी
जिले में उद्योगों की संख्या लगातार बढ़ रही है—
2023-24: 316 उद्योग
2024-25: 393 उद्योग
2025-26: 402 उद्योग
लेकिन सीएसआर योगदान का हाल इसके उलट है।
सीएसआर शाखा के अनुसार:
2023-24: 3 कंपनियां, ₹8.43 करोड़
2024-25: 12 कंपनियां, ₹31.03 करोड़
2025-26: 1 कंपनी, ₹20.01 करोड़
विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़े:
2024-25: 12 कंपनियां, ₹26.68 करोड़
2025-26: 5 कंपनियां, ₹15.22 करोड़
2026-27: 4 कंपनियां, ₹2.12 करोड़ (अब तक)
स्पष्ट है कि एक ही वर्ष के आंकड़ों में भी समानता नहीं है। यह अंतर सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर खामी की ओर इशारा करता है।
कौन आगे, कौन पीछे?
उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ होता है कि—
सबसे अधिक योगदान: वर्ष 2024-25 में 12 कंपनियों द्वारा (₹31.03 करोड़ / ₹26.68 करोड़ — स्रोत के अनुसार)
सबसे कम सक्रियता: वर्ष 2023-24 में केवल 3 कंपनियां (₹8.43 करोड़)
सबसे असामान्य स्थिति: 2025-26 में एक ही कंपनी द्वारा ₹20.01 करोड़ जमा करना
यानी कई वर्षों में पूरा भार एक या कुछ कंपनियों पर ही आ जाता है, जबकि अन्य उद्योग लगभग निष्क्रिय रहते हैं।
कानून क्या कहता है, और हो क्या रहा है
कंपनीज एक्ट 2013 के अनुसार:
₹500 करोड़ से अधिक नेटवर्थ
₹1000 करोड़ से अधिक टर्नओवर
या ₹5 करोड़ से अधिक नेट प्रॉफिट
ऐसी कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के औसत मुनाफे का 2% सीएसआर में खर्च करना अनिवार्य है।
लेकिन रायगढ़ में कई कंपनियां
नुकसान दिखाकर
या बैलेंस शीट स्पष्ट न देकर
इस जिम्मेदारी से बचती नजर आ रही हैं।
31 कंपनियां दायरे में, लेकिन सक्रिय मुट्ठीभर
जिले में कम से कम 31 कंपनियां सीएसआर के दायरे में आती हैं, लेकिन हर साल केवल 3 से 13 कंपनियां ही योगदान देती हैं।
तीन साल के चक्र में भी सभी कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाई है।
बैलेंस शीट जांच का आदेश… फिर ठंडे बस्ते में
जिला प्रशासन ने एक समय कंपनियों की बैलेंस शीट मंगवाकर
नेटवर्थ
टर्नओवर
मुनाफा
की जांच करने का आदेश दिया था, ताकि सही सीएसआर राशि तय हो सके।
लेकिन यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।
जमीनी सवाल: किसके लिए है सीएसआर?
रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में, जहां
खनन
बिजली उत्पादन
भारी उद्योग
का बड़ा प्रभाव है, वहां स्थानीय समुदायों की अपेक्षाएं भी उतनी ही बड़ी हैं।
लेकिन जब सीएसआर की राशि अनिश्चित हो और कंपनियों की भागीदारी मनमानी हो, तो विकास योजनाएं भी प्रभावित होती हैं।
रायगढ़ में सीएसआर अब “अनिवार्य सामाजिक दायित्व” से ज्यादा “वैकल्पिक योगदान” बनता जा रहा है।
जरूरत है—
एकीकृत और पारदर्शी डेटा सिस्टम की
सभी पात्र कंपनियों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करने की
और प्रशासनिक निगरानी को मजबूत करने की
वरना हर साल यही सवाल उठता रहेगा—
“जब मुनाफा तय है, तो समाज का हिस्सा क्यों नहीं?”
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