कैग की रिपोर्ट पर विधानसभा मे बहस , ढेरों काम बगैर ग्रामसभा के मंजूरी के हुए

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
मनरेगा-डीएमएफ में अनियमितताओं का खुलासा
विधानसभा में पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हालिया रिपोर्ट छत्तीसगढ़ सरकार के वित्तीय प्रबंधन और जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीर कमियों को उजागर करती है।
कैग की रिपोर्ट में सामने आए मुख्य मुद्दों और आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:
1. बजट और वित्तीय प्रबंधन में चूक
रिपोर्ट से पता चलता है कि बजट प्रावधानों और वास्तविक खर्च के बीच एक बड़ा अंतर है, जिसके कारण कई विकास योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह गईं।
कागजों में सिमटी योजनाएं: वर्ष 2024-25 में 25 नई योजनाओं के लिए ₹261.41 करोड़ का बजटीय प्रावधान किया गया था, लेकिन पूरे वित्तीय वर्ष में इन पर एक भी रुपया खर्च नहीं हुआ।
कम खर्च और सरेंडर बजट: राज्य का कुल बजट ₹1.88 लाख करोड़ था, लेकिन वास्तविक व्यय केवल ₹1.59 लाख करोड़ ही हो पाया। इसके चलते बजट का 15.26% (₹28,759.93 करोड़) खर्च ही नहीं हो सका।
कर्ज का बोझ और राजस्व व्यय:
वर्ष 2024-25 में सरकार द्वारा लिए गए कुल ऋण का 47 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज को चुकाने में चला गया।
वर्ष 2020-21 से 2024-25 के दौरान कुल राजस्व व्यय का 39% से 50% हिस्सा केवल ब्याज, वेतन और पेंशन जैसे तय खर्चों पर ही खर्च हुआ।
2. डीएमएफ निधि के उपयोग में अनियमितताएं
जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफ) और प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के तहत मिले फंड के उपयोग में नियमों की भारी अनदेखी की गई।
बिना कार्ययोजना के खर्च: कई जिलों में बिना वार्षिक कार्ययोजना और बजट स्वीकृत किए ही करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए।
प्राथमिकता से भटकाव: नियमों के विपरीत, ₹30.73 करोड़ की राशि सरकारी कार्यालयों के निर्माण, नवीनीकरण, सौंदर्यीकरण और खरीदी पर खर्च कर दी गई।
अधूरी परियोजनाएं: पर्याप्त योजना और तकनीकी परीक्षण के अभाव में कला एवं संस्कृति केंद्र, बायोगैस संयंत्र और मुर्गी/मशरूम पालन जैसी परियोजनाओं पर ₹41.80 करोड़ खर्च होने के बाद भी वे अधूरी या अनुपयोगी पड़ी हैं।
भंडार क्रय नियमों का उल्लंघन:
बिना खुली निविदा (ओपन टेंडर) के, सीमित निविदा के आधार पर ₹17.49 करोड़ की खरीदी की गई।
बिना तकनीकी विनिर्देश तय किए ₹38.82 करोड़ की सामग्री खरीदी गई।
भारत सरकार के निर्देशों के खिलाफ जाकर ₹1.68 करोड़ राज्य स्तरीय जिला खनिज संस्थान प्रकोष्ठ को ट्रांसफर किए गए।
3. मनरेगा में बड़ी खामियां
ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में नियमों के उल्लंघन और मजदूरों के हकों की अनदेखी के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं।
ग्राम सभाओं की अनदेखी: बिना श्रम बजट और परिवारों के सर्वेक्षण के काम शुरू कराए गए। कैग की नमूना जांच में शामिल 48 ग्राम पंचायतों में लगभग 86% कार्य ग्राम सभा की अनिवार्य मंजूरी के बिना ही शुरू कर दिए गए।
मजदूरी भुगतान में देरी और ईपीएफ घोटाला: फंड उपलब्ध होने के बावजूद मजदूरों को भुगतान में देरी की गई। इसके अलावा, अप्रैल 2015 से मार्च 2023 के बीच कर्मचारियों के ईपीएफ का ₹29.62 करोड़ अंशदान जमा नहीं किया गया, जिसके कारण अब पेनाल्टी और ब्याज मिलाकर ₹84.59 करोड़ की देनदारी खड़ी हो गई है।
रोजगार वितरण में असंतुलन:
100 दिन से कम रोजगार: 134.10 लाख परिवारों में से 83% (111.31 लाख) परिवारों को 100 दिनों से कम काम मिला।
पूरे 100 दिन का रोजगार: केवल 0.92% (1.23 लाख) परिवार ही पूरे 100 दिन का रोजगार पा सके।
सकारात्मक पहलू (महिला भागीदारी): मनरेगा के तहत महिलाओं की भागीदारी 43% से 59% के बीच रही, जो कि कानूनी रूप से निर्धारित न्यूनतम 33% से अधिक है।
4. अर्थव्यवस्था के सकारात्मक संकेत
इन तमाम प्रशासनिक और वित्तीय गड़बड़ियों के बीच, छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कुछ राहत भरे आंकड़े भी सामने आए हैं:
संकेतक (Indicators)
GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) वर्ष 2020-21 में: ₹3.52 लाख करोड़
GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) वर्ष 2024-25 में: ₹5.67 लाख करोड़
वार्षिक GSDP वृद्धि दर: 2023-24 की तुलना में 10.89% की वृद्धि
राजस्व प्राप्तियां: पिछले वर्ष की तुलना में 16.21% की वृद्धि
GSDP के अनुपात में राजस्व प्राप्तियां: 20.21% से बढ़कर 21.18%
कैग की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि एक तरफ जहां राज्य की आर्थिक विकास दर (GSDP) और राजस्व में सुधार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ बजटीय नियंत्रण में कमी, बिना मंजूरी के खर्च और मनरेगा व डीएमएफ जैसी कल्याणकारी योजनाओं में जमीनी स्तर पर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही बनी हुई है।
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