‘सिर्फ जमीन नहीं, घर-परिवार भी गिने जाएं’—मुआवजा सर्वे को लेकर बरौद के प्रभावित ग्रामीणों ने घरघोड़ा एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
घरघोड़ा (रायगढ़)। बरौद क्षेत्र के विस्थापित परिवारों ने वर्षों से लंबित पड़े पुनर्वास और मुआवजा संबंधी मुद्दों को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। इस बार मांग सिर्फ अधिग्रहित जमीन तक सीमित नहीं, बल्कि उन वास्तविक जरूरतों तक पहुंचती है, जो समय के साथ परिवारों के बढ़ने और परिस्थितियों के बदलने से पैदा हुई हैं। प्रभावितों का कहना है कि “मुआवजा नीति कागजों में अटकी रही, जबकि जमीन पर जिंदगी आगे बढ़ती रही”—और इसी अंतर ने आज कई परिवारों को हक से दूर कर दिया है।
ग्राम बरौद के समस्त विस्थापित परिवारों ने चरणबद्ध तरीके से अपनी मांगों को प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन तक पहुंचाना शुरू कर दिया है। पहले चरण में कलेक्टर जनदर्शन, रायगढ़ में, दूसरे चरण में बरौद उपक्षेत्र के उपक्षेत्रीय प्रबंधक के समक्ष और तीसरे चरण में घरघोड़ा एसडीएम को विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन में साफ तौर पर कहा गया है कि अधिग्रहण और विस्थापन की प्रक्रिया लंबी खिंचने के कारण परिवारों का आकार बढ़ा, जरूरतें बदलीं और लोगों को मजबूरी में अपने स्तर पर अतिरिक्त आवासीय निर्माण करने पड़े।

विस्थापितों के मुताबिक, कई परिवारों ने निजी संसाधनों से नए मकान बनाए, कुछ ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर खड़े किए, तो कई ने जल संकट से निपटने के लिए कुएं और बोरवेल खुदवाए। लेकिन इन सभी परिसंपत्तियों का न तो कभी सर्वे हुआ और न ही उनका मूल्यांकन किया गया। परिणामस्वरूप, ये परिवार पुनर्वास पैकेज और मुआवजा लाभ की गणना से बाहर रह गए—एक तरह से “अदृश्य नुकसान” झेलते हुए।
ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया गया है कि यदि सर्वेक्षण वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होगा, तो मुआवजा प्रक्रिया अधूरी ही मानी जाएगी। विस्थापितों ने प्रशासन से मांग की है कि एसईसीएल और जिला प्रशासन की संयुक्त टीम गठित कर जल्द से जल्द व्यापक सर्वे कराया जाए, जिसमें प्रत्येक घर, निर्माण और जलस्रोत का निष्पक्ष मूल्यांकन शामिल हो।

मामले को लेकर अब स्वर भी तेज होने लगे हैं। विस्थापित परिवारों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि समयबद्ध और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे बरौद खुली खदान के मुख्य प्रवेश द्वार पर शांतिपूर्ण अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे। उनका कहना है कि यह सिर्फ मुआवजे की लड़ाई नहीं, बल्कि “सम्मानजनक पुनर्वास” की मांग है—जहां कागजी आंकड़ों के बजाय जमीन की सच्चाई को आधार बनाया जाए।


स्थानीय प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से यह मुद्दा संगठित रूप ले रहा है, उससे आने वाले दिनों में यह क्षेत्रीय स्तर पर एक बड़े जनमुद्दे के रूप में उभर सकता है।
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