घरघोड़ा जनपद पंचायत घोटाला: फर्जी बिलों के ‘सफर’ पर उठे सवाल, क्या जांच की आंच से बच पाएंगे जिम्मेदार?

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
मुख्य बिंदु:
बैक डेटेड बिलों (2023) पर भुगतान का मामला गरमाया, वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ने का आरोप।
कागजों में दौड़ीं गाड़ियां: ग्रामीण पूछ रहे– “हमें बिलासपुर कब ले गए साहब?”
RTI के खुलासे के बाद जिला प्रशासन पर निष्पक्ष जांच का भारी दबाव।
घरघोड़ा। जनपद पंचायत घरघोड़ा की आवास शाखा में प्रचार-प्रसार की करीब 7 लाख रुपये की राशि को वाहन खर्च में खपाने के सनसनीखेज मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। सूचना के अधिकार (RTI) से बाहर आए दस्तावेजों ने जहां एक ओर भ्रष्टाचार की पोल खोली है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया है।
इस खुलासे के बाद अब क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि क्या वास्तव में सरकारी खजाने को चूना लगाने वाले चेहरों को बेनकाब किया जाएगा, या फिर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश होगी?
‘टाइम ट्रैवल’ वाले बिलों पर घिरे अधिकारी
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘टाइम ट्रैवल’ (समय से आगे का खेल) जैसा है। नियम कहते हैं कि बजट मिलने के बाद राशि खर्च की जाती है, लेकिन घरघोड़ा जनपद पंचायत में उलटी गंगा बह रही है। आवास शाखा को आबंटन राशि वर्ष 2024 में प्राप्त होती है, जबकि भुगतान के लिए लगाए गए बिल साल 2023 के हैं।
बड़ा सवाल: कोई भी सरकारी विभाग बजट आने से एक साल पहले ही निजी वाहनों का लाखों रुपये का बिल कैसे भुगत सकता है? यह सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता और अधिकारियों की घोर लापरवाही या सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करता है।
कागजी बिलासपुर यात्रा: ग्रामीण बोले– “हमें तो पता ही नहीं!”
दस्तावेजों में दर्शाया गया है कि ग्रामीणों को पिकअप, छोटा हाथी और मोटरसाइकिलों से बिलासपुर ले जाया गया था। लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। सूत्रों और स्थानीय दावों के अनुसार, जिन ग्रामीणों के नाम पर यह यात्रा दर्शाई गई है, उनमें से अधिकांश को इस बात की भनक तक नहीं है कि वे कभी सरकारी खर्च पर बिलासपुर गए भी थे।
मोटरसाइकिल जैसे दोपहिया वाहनों के बिल लगाकर ग्रामीणों को बिलासपुर ले जाने का दावा अपने आप में हास्यास्पद और अधिकारियों की हड़बड़ी में की गई गड़बड़ी को बयां करता है।
जांच के रडार पर ‘फर्जी’ वेंडर्स और बिल बुक
इस मामले में सबसे अहम कड़ी वे वाहन मालिक और कथित एजेंसियां हैं, जिनके नाम पर बिल जारी किए गए हैं। सूत्रों का दावा है कि इनमें से कई बिल सिर्फ एक ही प्रिंटिंग प्रेस से छपवाकर रातों-रात तैयार किए गए संदिग्ध वेंडर बिल हैं। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि:
1. लॉग बुक की जांच हो: जिन वाहनों के नंबर बिल में दर्ज हैं, उनकी वास्तविक लोकेशन और टोल प्लाजा के रिकॉर्ड खंगाले जाएं।
2. कैश फ्लो ट्रैकिंग: भुगतान की गई राशि अंततः किस बैंक खाते में गई और उसे किसने निकाला, इसकी कड़ाई से जांच हो।
प्रशासन के रुख पर टिकी नजरें
सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार (IEC activities) के लिए आने वाला पैसा इसलिए होता है ताकि अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी मिल सके। लेकिन घरघोड़ा में इस राशि का कथित तौर पर ‘सफर’ करा दिया गया।
अब गेंद जिला प्रशासन और जिला पंचायत सीईओ के पाले में है। क्या इस गंभीर वित्तीय गड़बड़ी पर तत्काल संज्ञान लेकर दोषियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराई जाएगी, या विभागीय जांच के नाम पर मामले को लंबा खींचा जाएगा? क्षेत्र की जनता अब इस पर सीधी कार्रवाई का इंतजार कर रही है।
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