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रायगढ़ में फ्लाई ऐश का “100% उपयोग” का दावा—कागज़ों में सफाई, ज़मीन पर सवाल बाकी

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़।
जिले के थर्मल पावर प्लांट्स से अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच उत्पादित फ्लाई ऐश की ताज़ा रिपोर्ट एक दिलचस्प—और उतनी ही चिंताजनक—तस्वीर पेश करती है। आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश इकाइयों ने अपने-अपने स्तर पर फ्लाई ऐश का उपयोग “लगभग 100 प्रतिशत” तक दिखाया है। पहली नज़र में यह पर्यावरणीय प्रबंधन की बड़ी सफलता लगती है, लेकिन जब इन्हीं आंकड़ों को बारीकी से पढ़ा जाए, तो कई परतें खुलती हैं—और कई सवाल भी खड़े होते हैं।

कुल तस्वीर: भारी उत्पादन, कागज़ी संतुलन

रिपोर्ट के अनुसार, जिले में कुल लगभग 1.92 करोड़ मीट्रिक टन फ्लाई ऐश का उत्पादन हुआ। इसके मुकाबले कुल उपयोग का आंकड़ा भी लगभग इसी के आसपास दिखाया गया है।
कागज़ों में यह “संतुलन” पर्यावरणीय नियमों के पालन का संकेत देता है, लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि:

उपयोग का बड़ा हिस्सा माइन फिलिंग (खनन भराई) और रोड निर्माण में दिखाया गया है

कई इकाइयों ने ब्रिक मैन्युफैक्चरिंग और लैंड फिलिंग को प्रमुख उपयोग बताया है

“अन्य उपयोग” (Others) कॉलम कई जगह खाली या न्यूनतम है


यानी उपयोग के दावे सीमित श्रेणियों में केंद्रित हैं—जो जमीनी सत्यापन की मांग करते हैं।

बड़े प्लांट्स की भूमिका: आंकड़े भारी, पारदर्शिता हल्की

जिले के बड़े संयंत्रों में शामिल एक प्रमुख थर्मल प्लांट ने अकेले ही करीब 89 लाख मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पादन दिखाया है, जिसमें से बड़ी मात्रा माइन फिलिंग में उपयोग दर्शाई गई है।
इसी तरह एक अन्य बड़े प्रोजेक्ट ने भी 30 लाख टन से अधिक उत्पादन और लगभग पूरा उपयोग दर्ज किया है।

यहां सवाल यह है कि:

क्या माइन फिलिंग वास्तव में उसी अनुपात में हो रही है?

क्या परिवहन, भंडारण और उपयोग की स्वतंत्र निगरानी हो रही है?


छोटे प्लांट्स: 100% उपयोग का एक जैसा पैटर्न

रिपोर्ट में छोटे और मध्यम संयंत्रों की सूची भी शामिल है, जिनमें से अधिकांश ने 100% उपयोग का दावा किया है।
दिलचस्प बात यह है कि कई इकाइयों में:

उत्पादन और उपयोग के आंकड़े लगभग समान हैं

उपयोग का प्रमुख माध्यम ब्रिक निर्माण या लैंड फिलिंग बताया गया है


यह पैटर्न “कॉपी-पेस्ट रिपोर्टिंग” की आशंका को भी जन्म देता है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जमीन पर हकीकत: धूल, राख और शिकायतें

रायगढ़ और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की शिकायतें इन दावों से मेल नहीं खातीं।
स्थानीय लोगों के मुताबिक:

कई जगहों पर फ्लाई ऐश खुले में डंप होती है

ट्रकों से परिवहन के दौरान धूल का गुबार उड़ता है

बारिश में यही राख बहकर खेती और जल स्रोतों तक पहुंचती है


अगर उपयोग वास्तव में 100% हो रहा है, तो फिर यह खुला प्रदूषण क्यों दिखता है?

“रोड मेकिंग” और “माइन फिलिंग”: आसान विकल्प?

विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लाई ऐश के उपयोग के लिए सीमेंट, कंक्रीट और वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स अधिक टिकाऊ विकल्प हैं।
लेकिन रिपोर्ट बताती है कि:

सबसे अधिक उपयोग माइन फिलिंग में दिखाया गया

उसके बाद रोड निर्माण


ये दोनों विकल्प अपेक्षाकृत आसान हैं, लेकिन इनके पर्यावरणीय प्रभाव और दीर्घकालिक निगरानी पर सवाल बने रहते हैं।

नियमन बनाम वास्तविकता

पर्यावरण मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, फ्लाई ऐश का वैज्ञानिक और सुरक्षित उपयोग अनिवार्य है।
लेकिन रायगढ़ की यह रिपोर्ट संकेत देती है कि:

नियमों का पालन कागज़ों पर मजबूत दिख रहा है

जमीनी स्तर पर सत्यापन और पारदर्शिता की कमी है


आंकड़ों की चमक में छुपे धुंधले सच

रायगढ़ की फ्लाई ऐश रिपोर्ट एक ऐसा दस्तावेज़ है जो “उपलब्धि” का दावा करता है, लेकिन उसी में कई अनुत्तरित सवाल भी छोड़ जाता है।
100% उपयोग का आंकड़ा जितना प्रभावशाली है, उतना ही संदेहास्पद भी—क्योंकि पर्यावरणीय सच्चाई सिर्फ तालिकाओं में नहीं, जमीन पर दिखती है।

अब ज़रूरत है:

स्वतंत्र ऑडिट की

ग्राउंड वेरिफिकेशन की

और सबसे महत्वपूर्ण, जनता के अनुभव को डेटा के साथ जोड़कर देखने की


क्योंकि जब आंकड़े और वास्तविकता में दूरी बढ़ती है, तो सबसे पहले सच ही दबता है—और उसके साथ पर्यावरण भी।

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Amar Chouhan

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