“क्या ‘क्लीन चिट’ की आड़ में गायब हो गया सबूत? वन-खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल”

Journalist Amardeep chauhan
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धरमजयगढ़ (रायगढ़)। अवैध कोयला खनन के मामलों में प्रशासनिक सख्ती के दावों के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने न केवल विभागीय समन्वय बल्कि कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला सिर्फ एक जब्त मशीन की रिहाई का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें नियमों का अनुपालन व्यक्ति विशेष के प्रभाव के अनुसार बदलता प्रतीत होता है।
फरवरी माह में धरमजयगढ़-घरघोड़ा क्षेत्र के बोरो इलाके में संयुक्त टीम ने नदी किनारे अवैध कोयला उत्खनन करते हुए एक चेन माउंटेन मशीन को जब्त किया था। मौके से करीब 40 टन कोयला भी बरामद हुआ था। प्रारंभिक जांच में वन भूमि पर खनन की आशंका के चलते प्रकरण वन विभाग को भेजा गया—जहां से केवल भूमि की स्थिति स्पष्ट कर फाइल वापस लौटाई जानी थी।
लेकिन यहीं से घटनाक्रम ने असामान्य मोड़ ले लिया।
सूत्रों के अनुसार, वन विभाग ने संबंधित भूमि को वन क्षेत्र से बाहर बताते हुए न केवल वाहन स्वामी को राहत दे दी, बल्कि जब्त मशीन को भी मुक्त कर दिया। यह निर्णय उस समय लिया गया जब खनिज विभाग की ओर से लगभग साढ़े आठ लाख रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की जा चुकी थी और उसकी वसूली शेष थी।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—जब पेनाल्टी जमा नहीं हुई थी, तब जब्त मशीन को किस आधार पर छोड़ा गया?
खनिज विभाग के अभिलेख बताते हैं कि बरामद कोयला जी-5 ग्रेड का था और विधिवत परीक्षण के बाद जुर्माना तय किया गया। इसके बावजूद अब विभाग स्वयं यह स्वीकार कर रहा है कि वाहन स्वामी उसकी पहुंच से बाहर है। यानी मशीन भी गई, मालिक भी गायब और पेनाल्टी भी अधर में।
दोहरे मानदंड?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि जहां रेत परिवहन में पकड़े गए छोटे वाहन चालकों को जुर्माना जमा होने तक हफ्तों थानों या चौकियों में खड़ा रखा जाता है, वहीं इस मामले में असाधारण ‘उदारता’ क्यों दिखाई गई? क्या यह केवल प्रक्रियागत चूक है या फिर प्रभावशाली नेटवर्क का असर?
अधिकार क्षेत्र की सीमा या अतिक्रमण?
प्रशासनिक दृष्टि से भी यह मामला पेचीदा है। जानकारों का कहना है कि वन विभाग की भूमिका केवल भूमि की स्थिति स्पष्ट करने तक सीमित थी, लेकिन उसने आगे बढ़कर जब्ती कार्रवाई को ही प्रभावित कर दिया। इससे न केवल अधिकार क्षेत्र की सीमाएं धुंधली हुईं, बल्कि विभागीय जवाबदेही भी सवालों के घेरे में आ गई।
स्थानीय दावे और जमीनी हकीकत
ग्रामीणों का दावा है कि उक्त क्षेत्र में कई दिनों से खनन गतिविधियां चल रही थीं। कोल सीम के ऊपर ओवरबर्डन की परत कम होने के कारण मशीनों से आसानी से कोयला निकाला जा रहा था। यदि यह सही है, तो सवाल और गहरा हो जाता है—क्या निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय था या जानबूझकर आंखें मूंदी गई थीं?
अधिकारियों का पक्ष
धरमजयगढ़ के डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने कहा है कि वे फाइल देखने के बाद ही स्पष्ट टिप्पणी करेंगे। वहीं जिला खनिज अधिकारी रमाकांत सोनी ने अवैध खनन को गंभीर अपराध बताते हुए पेनाल्टी निर्धारित होने की पुष्टि की है।
मुख्य सवाल अब भी बाकी:
– बिना पेनाल्टी वसूली के जब्त मशीन कैसे मुक्त हुई?
– क्या वन विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र से आगे जाकर निर्णय लिया?
– वाहन स्वामी को संरक्षण मिला या यह महज लापरवाही का मामला है?
– और सबसे अहम—क्या जिले में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई वास्तव में समान रूप से हो रही है?
यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया की त्रुटि नहीं रह गया है, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन की कसौटी बन चुका है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब नहीं मिलते, तब तक संदेह की यह परछाई बनी रहना तय है।
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