“कानूनी प्रक्रिया की चूक ने टाली 154 करोड़ की वसूली: हाई कोर्ट की टिप्पणी से CSPDCL की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
बिलासपुर/रायगढ़।
छत्तीसगढ़ के बिजली क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित टैरिफ विवाद में एक अहम मोड़ आया है। लगभग 154 करोड़ रुपये की रिकवरी से जुड़े मामले में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने तकनीकी आधार पर राहत तो दे दी है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मामला खत्म नहीं हुआ है—बल्कि अब असली परीक्षा नियामक आयोग में होगी। इस घटनाक्रम ने न केवल सरकारी कंपनी CSPDCL की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि प्रक्रियात्मक चूक किस तरह बड़े आर्थिक मामलों की दिशा बदल सकती है।
मामला रायगढ़ स्थित एक बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान और राज्य की बिजली वितरण कंपनी के बीच वर्षों पुराने वित्तीय विवाद से जुड़ा है। आरोप है कि 2011 के एक बिजली आपूर्ति समझौते के तहत तय शर्तों के विपरीत भुगतान हुआ, जिससे कंपनी को करीब 153.55 करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ मिला। बाद में ऑडिट और नियामकीय समीक्षा में यह अंतर सामने आया, जिसके बाद 2016 में CSPDCL ने रिकवरी नोटिस जारी किया।
हालांकि, यह नोटिस ही अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पाया कि इतनी बड़ी राशि की वसूली से पहले संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का समुचित अवसर नहीं दिया गया। न्यायालय ने इसे “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों” का उल्लंघन मानते हुए नोटिस को निरस्त कर दिया। अदालत की इस टिप्पणी ने साफ संकेत दिया कि निर्णय जितना महत्वपूर्ण होता है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी प्रक्रिया भी होती है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी मामले में कुछ समय पहले सिंगल बेंच ने CSPDCL की कार्रवाई को सही ठहराया था। लेकिन अपील में गए मामले में प्रक्रियात्मक खामी इतनी गंभीर मानी गई कि पूरा फैसला ही पलट गया। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक और कानूनी सतर्कता में छोटी सी चूक भी बड़े मामलों में निर्णायक साबित हो सकती है।
अब यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) के पास फिर से जाएगा, जहां दोनों पक्षों को अपने-अपने दावे और आंकड़े विस्तार से रखने होंगे। माना जा रहा है कि इस बार केवल कागजी औपचारिकताओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि बिजली आपूर्ति, दर निर्धारण और भुगतान के हर पहलू की गहराई से जांच होगी।
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह विवाद केवल एक कंपनी या एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली को आईना दिखाता है। खासकर तब, जब सार्वजनिक धन और उपभोक्ताओं के हित दांव पर हों। यदि वाकई अतिरिक्त भुगतान हुआ है, तो उसकी वसूली सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन उतना ही अनिवार्य है।
फिलहाल, अदालत से मिली राहत को अंतिम जीत मानना जल्दबाजी होगी। नियामक आयोग में होने वाली सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी। वहां यह स्पष्ट होगा कि क्या वास्तव में अतिरिक्त भुगतान हुआ था और यदि हां, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी तंत्र बड़े आर्थिक मामलों में उतनी ही सावधानी बरत रहा है, जितनी अपेक्षित है? या फिर प्रक्रियात्मक लापरवाही ही ऐसे मामलों को वर्षों तक उलझाए रखती है।
Now U can Download Amar khabar from google play store also.