रुपेश पटेल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, तमनार आंदोलन मामले की चार एफआईआर में गिरफ्तारी पर रोक

Journalist Amardeep chauhan
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रायगढ़। तमनार क्षेत्र में जिंदल कोल माइंस की जनसुनवाई के दौरान हुए आंदोलन और उसके बाद दर्ज आपराधिक मामलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम राहत प्रदान करते हुए एक आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। न्यायालय का यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें एक ही घटनाक्रम से संबंधित चार अलग-अलग एफआईआर दर्ज किए जाने को चुनौती दी गई थी।
जानकारी के अनुसार, 27 दिसंबर को तमनार क्षेत्र के लिबरा स्थित सीएचपी चौक के पास जिंदल कोल माइंस की जनसुनवाई के दौरान विरोध प्रदर्शन हुआ था। इस दौरान तनावपूर्ण स्थिति निर्मित होने और कथित हिंसक घटनाओं के बाद तमनार पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत कई प्रकरण दर्ज किए थे। इन मामलों में क्षेत्र के निवासी रुपेश पटेल को भी आरोपी बनाया गया था।
मामले ने उस समय कानूनी मोड़ ले लिया जब याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि एक ही घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों के आधार पर अलग-अलग चार एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिससे गिरफ्तारी और बहुस्तरीय आपराधिक कार्रवाई की आशंका उत्पन्न हो गई है। इसी आधार पर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया।
सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से प्रस्तुत दलीलों और उपलब्ध अभिलेखों पर प्रारंभिक विचार करने के बाद न्यायालय ने अंतरिम राहत देते हुए संबंधित चारों मामलों में गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश पारित किया। हालांकि, यह राहत अंतिम निर्णय नहीं है और मामले की विस्तृत सुनवाई अभी शेष है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि एक ही घटना से जुड़े मामलों में बहुविध एफआईआर दर्ज होने के प्रश्न पर समय-समय पर न्यायालयों ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप न केवल संबंधित पक्ष को तत्काल राहत प्रदान करता है, बल्कि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया को भी न्यायिक कसौटी पर परखने का अवसर देता है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मनीष बेहरा एवं आशुतोष विश्वास ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी की है। अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष यह पक्ष रखा कि समान घटनाक्रम को आधार बनाकर दर्ज किए गए मामलों के कारण याचिकाकर्ता को अनावश्यक कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए न्यायिक संरक्षण आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तमनार आंदोलन से जुड़े मामलों को लेकर क्षेत्र में चर्चाएं तेज हो गई हैं। आदेश को फिलहाल याचिकाकर्ता पक्ष के लिए बड़ी कानूनी राहत के रूप में देखा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, मामले के गुण-दोष और दर्ज एफआईआर की वैधता पर अंतिम निर्णय न्यायालय में आगामी सुनवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
गौरतलब है कि तमनार क्षेत्र में प्रस्तावित औद्योगिक एवं खनन परियोजनाओं को लेकर समय-समय पर जनसुनवाई और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। ऐसे मामलों में कानून-व्यवस्था, जनभागीदारी और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती माना जाता है।
फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश ने मामले को नया आयाम दे दिया है और अब सभी की निगाहें आगामी न्यायिक कार्यवाही पर टिकी हुई हैं, जहां इस पूरे प्रकरण से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर विस्तृत सुनवाई होने की संभावना है।
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