“वादों की राजनीति या समाज का अपमान? चौहान समाज में उबलता गुस्सा—अब ‘घोषणा’ नहीं, ‘जवाब’ चाहिए”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
बरमकेला।
लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने वाली भीड़ नहीं होती, बल्कि वह भरोसे की सबसे बड़ी ताकत होती है। लेकिन जब इसी भरोसे को बार-बार मंचों से किए गए वादों की भेंट चढ़ा दिया जाए, तो वह ताकत आक्रोश में बदलते देर नहीं लगाती। बरमकेला में आज यही हो रहा है।
चौहान समाज के साथ जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक अधूरी घोषणा का मामला नहीं है—यह सीधे-सीधे विश्वास के साथ किया गया व्यवहार है, जिसे अब समाज “राजनीतिक छल” कहने लगा है।
एक सार्वजनिक मंच, तालियों की गूंज और बड़े भरोसे के साथ किया गया वादा—समाज भवन के लिए 5 लाख रुपये। यह कोई निजी बातचीत नहीं थी, यह जनता के सामने दिया गया आश्वासन था। लेकिन सवाल यह है कि वह वादा आखिर गया कहाँ?
क्यों वर्षों बाद भी जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई?
जब जवाब मांगा गया, तो हर बार नया बहाना सामने आया—कभी प्रक्रिया, कभी फंड, कभी तकनीकी अड़चन। और जब मामला सार्वजनिक हुआ, तो एक नया दांव—“अब 5 नहीं, 10 लाख देंगे।”
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या घोषणाएं अब समस्या का समाधान नहीं, बल्कि असंतोष को टालने का साधन बन चुकी हैं?
यह सिर्फ देरी नहीं, यह जवाबदेही से बचने की कोशिश है।
खैरगढ़ी में 3 लाख की घोषणा भी आज तक फाइलों में दम तोड़ रही है। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि योजनाएं प्राथमिकता के आधार पर नहीं, बल्कि पसंद और प्रभाव के आधार पर चल रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या चौहान समाज सिर्फ चुनावी गणित का हिस्सा है?
जब वोट की जरूरत होती है, तब मंच साझा होता है, सम्मान समारोह होते हैं, और बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन जब उन वादों को निभाने की बारी आती है, तो वही समाज किनारे खड़ा दिखाई देता है।
यही वजह है कि अब चौहान समाज के भीतर आक्रोश खुलकर सामने आ रहा है। युवाओं की भाषा साफ है—
“अब भरोसा नहीं, हिसाब होगा।”
राजनीतिक संकेत भी स्पष्ट हैं।
स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का मोहभंग अब खुलकर सामने आने लगा है। जो लोग वर्षों तक एक विचारधारा के साथ खड़े रहे, वे आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
अगर यह असंतोष यूँ ही बढ़ता रहा, तो यह सिर्फ एक समाज का मुद्दा नहीं रहेगा—यह पूरे क्षेत्र की राजनीति का समीकरण बदल सकता है।
यह समाज अब सवाल पूछता है—और जवाब चाहता है:
– क्या घोषणाएं सिर्फ तालियां बटोरने के लिए थीं?
– अगर राशि स्वीकृत हुई, तो उसका उपयोग क्यों नहीं हुआ?
– अगर नहीं हुई, तो सार्वजनिक मंच से घोषणा क्यों की गई?
– और सबसे अहम—क्या अब भी समाज को सिर्फ आश्वासन देकर शांत करने की कोशिश की जाएगी?
समय निकल रहा है।
जनप्रतिनिधियों के पास अभी भी अवसर है—वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें, पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करें और तत्काल ठोस कदम उठाएं।
क्योंकि अब यह मामला सिर्फ एक भवन का नहीं रहा, यह सम्मान और विश्वास का सवाल बन चुका है।
बरमकेला का संदेश साफ है—
“अब वादे नहीं, काम दिखना चाहिए… वरना जवाब भी मिलेगा, और उसका असर भी।”
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