“छाल रेंज में लकड़ी तस्करी का खुला खेल: तहसीलदार की दबिश से बेनकाब सिस्टम, वन विभाग की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
कुड़ेकेला/छाल/धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ वनमंडल के छाल रेंज से सामने आई ताजा कार्रवाई ने एक बार फिर जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीती रात राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम ने एक बड़े लकड़ी तस्करी प्रयास को नाकाम करते हुए ट्रक जब्त किया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी उजागर कर दिया कि क्षेत्र में अवैध कटाई और परिवहन लंबे समय से बेखौफ जारी है।
जानकारी के मुताबिक, ट्रक क्रमांक CG 04 JD 9323 में महानिम, नीलगिरी और सागौन जैसी कीमती लकड़ियां भरकर धरमजयगढ़ से खरसिया की ओर ले जाई जा रही थीं। इसी दौरान छाल के तहसीलदार लोमस मिरी को मिली सूचना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए घेराबंदी की गई। टीम को देखते ही चालक और हेल्पर वाहन छोड़कर मौके से फरार हो गए, जिन्हें पकड़ने के प्रयास जारी हैं।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। क्षेत्र में लंबे समय से संगठित तरीके से लकड़ी तस्करी का नेटवर्क सक्रिय है। हैरानी की बात यह है कि जिन जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी वन विभाग पर है, वहीं से ट्रकों में भरकर लकड़ियां निकल रही हैं और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती।

इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी तस्करी बिना किसी आंतरिक मिलीभगत के संभव है? ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों के बीच यह चर्चा आम है कि विभागीय लापरवाही या साठगांठ के बिना इस स्तर पर अवैध कटाई संभव नहीं।
वन विभाग की निष्क्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में इसी क्षेत्र में दो हाथी शावकों की मौत की घटना भी सामने आई थी, जिसकी जानकारी भी विभाग को देर से मिली। लगातार हो रही घटनाओं ने विभाग के सूचना तंत्र और निगरानी व्यवस्था की पोल खोल दी है।
राजस्व और पुलिस विभाग की इस संयुक्त कार्रवाई के बाद लकड़ी माफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है। प्रशासन ने फरार आरोपियों और वाहन मालिक की तलाश तेज कर दी है। हालांकि, इस कार्रवाई के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि जब अन्य विभाग सक्रिय होकर तस्करी पर रोक लगा सकते हैं, तो वन विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में क्यों पीछे रह जाता है?
फिलहाल, जब्त लकड़ी और वाहन को लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है। लेकिन इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो क्षेत्र के वन संसाधनों का दोहन इसी तरह जारी रहेगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस कार्रवाई के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या फिर मामला कुछ समय बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा।