पेलमा की धरती पर ‘विकास’ बनाम ‘वजूद’ की जंग: 362 हेक्टेयर जंगल और 14 गांवों पर संकट, 19 मई की जनसुनवाई बनी निर्णायक मोड़

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़।
तमनार अंचल की फिज़ा इन दिनों सिर्फ गर्मियों की तपिश से नहीं, बल्कि एक बड़े फैसले की आहट से भी भारी है। पेलमा क्षेत्र में प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना ने एक बार फिर ‘विकास’ और ‘वजूद’ के बीच पुरानी बहस को जगा दिया है। एसईसीएल की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत जहां एक ओर ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विस्तार का रास्ता तैयार करने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर 362 हेक्टेयर वन भूमि और 14 गांवों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के मुताबिक, करीब 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इस प्रस्तावित खदान परियोजना से लगभग 1350 परिवार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इनमें अधिकांश वे लोग हैं, जिनकी आजीविका जल, जंगल और जमीन पर टिकी है। ऐसे में यह परियोजना सिर्फ जमीन अधिग्रहण का मसला नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक अस्तित्व और पारंपरिक जीवनशैली के सामने खड़ी चुनौती बन चुकी है।
पहले के अनुभवों से उपजा अविश्वास
तमनार और आसपास के इलाकों में बीते वर्षों में स्थापित उद्योगों और खदानों ने विकास की एक अलग तस्वीर जरूर पेश की, लेकिन इसके साथ ही विस्थापन, प्रदूषण और अधूरे पुनर्वास की कहानियां भी पीछे छोड़ दीं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछली परियोजनाओं में किए गए वादे कागज़ों तक ही सीमित रह गए। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास के नाम पर जो उम्मीदें जगाई गई थीं, वे आज भी अधूरी हैं। यही वजह है कि अब जब पेलमा परियोजना की बात सामने आई है, तो लोगों का भरोसा पहले से ही डगमगाया हुआ है।
पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता गहराई
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र की कटाई से न सिर्फ जैव विविधता प्रभावित होगी, बल्कि क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ेगा। जल स्रोतों के सूखने, भूजल स्तर में गिरावट और वायु प्रदूषण में वृद्धि जैसी आशंकाएं पहले से ही जताई जा रही हैं। रायगढ़ जिला पहले ही औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहा है, ऐसे में एक और बड़ी खदान परियोजना पर्यावरणीय संकट को और गहरा सकती है।
जनसुनवाई से पहले बन रही टकराव की जमीन
19 मई को अटल चौक, पेलमा में प्रस्तावित जनसुनवाई अब इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बिंदु बन गई है। प्रशासन, कंपनी और स्थानीय ग्रामीण—तीनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं। लेकिन जिस तरह हाल के महीनों में अडाणी और जिंदल समूह की परियोजनाओं के खिलाफ ग्रामीणों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया है, उससे यह साफ है कि इस बार की जनसुनवाई आसान नहीं होने वाली।
स्थानीय स्तर पर बैठकों का दौर जारी है, और ग्रामीण अपने अधिकारों और मांगों को लेकर एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं। यह विरोध केवल मुआवजे या नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई के रूप में उभर रहा है।
आख़िर किस दिशा में जाएगा फैसला?
पेलमा की यह परियोजना अब सिर्फ एक औद्योगिक योजना नहीं रही, बल्कि यह उस सवाल का प्रतीक बन चुकी है, जिसका जवाब पूरे क्षेत्र को तलाशना है—क्या विकास की कीमत जंगल और गांवों के उजड़ने से चुकाई जानी चाहिए?
19 मई की जनसुनवाई इस सवाल का सीधा जवाब भले न दे पाए, लेकिन यह जरूर तय करेगी कि आगे की राह संघर्ष से गुजरेगी या सहमति से निकलेगी। फिलहाल तमनार की धरती पर हर निगाह उसी दिन पर टिकी है, जब यह तय होगा कि पेलमा में खदान की खुदाई शुरू होगी या विरोध की आवाजें और बुलंद होंगी।
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