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“थाली में जहर, पटरियों पर लापरवाही: ‘अपरिचित’ का सिस्टम अब रेलवे में”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

भारतीय रेलवे खुद को देश की जीवनरेखा कहता है—और यह सच भी है। हर दिन करोड़ों लोग इसकी पटरियों पर भरोसा रखकर सफर करते हैं। लेकिन जब वही भरोसा खाने की थाली में परोसी गई लापरवाही से टूटने लगे, तो सवाल सिर्फ एक सेवा का नहीं, पूरे सिस्टम की नीयत और जवाबदेही का उठता है।

15 मार्च 2026 को ट्रेन संख्या 21896, पटना–टाटानगर वंदे भारत एक्सप्रेस में सामने आया मामला कोई “एक्सेप्शन” नहीं, बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति का हिस्सा है। भोजन की गुणवत्ता पर गंभीर शिकायत के बाद आईआरसीटीसी पर ₹10 लाख का जुर्माना और संबंधित सेवा प्रदाता पर ₹50 लाख की पेनाल्टी के साथ अनुबंध समाप्त करने का फैसला—यह दिखाता है कि रेलवे अब कम से कम कागजों में सख्ती दिखा रहा है।

लेकिन सवाल यह है कि
क्या यह कार्रवाई समस्या का समाधान है, या सिर्फ एक ‘डैमेज कंट्रोल’?



थाली का सच: शिकायतें अब सामान्य हो चुकी हैं

आजाद हिन्द एक्सप्रेस हो या हावड़ा–मुंबई रूट की लंबी दूरी की ट्रेनें—यात्रियों की शिकायतों में एक पैटर्न साफ दिखता है:

बासी खाना

खराब पैकेजिंग

स्वच्छता की अनदेखी

ओवरप्राइसिंग और घटिया क्वालिटी


रेलवे दावा करता है कि रोजाना 15 लाख से ज्यादा यात्रियों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है—दुनिया का सबसे बड़ा ऑनबोर्ड फूड नेटवर्क। लेकिन इतनी बड़ी व्यवस्था में यदि गुणवत्ता ही नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो यह “सिस्टम की विफलता” बन जाती है।



‘अपरिचित’ का संदर्भ: जब सिस्टम को आईना दिखाने कोई नहीं आता

साउथ की फिल्म “अपरिचित (Anniyan)” में एक किरदार है—जो सिस्टम की लापरवाही पर कानून के दायरे से बाहर जाकर सजा देता है। वह काल्पनिक कहानी थी, लेकिन उसका मूल सवाल आज भी जिंदा है: जब जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तो जवाबदेही कौन तय करेगा?

रेलवे के इस मामले में भी वही सवाल गूंजता है।
क्या केवल जुर्माना लगाकर हम यह मान लें कि समस्या खत्म हो गई?
या फिर यह स्वीकार करें कि “लापरवाही अब व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है”?


कार्रवाई बनाम वास्तविक सुधार

रेलवे सुरक्षा एवं सलाहकार का बयान—“यात्री सुरक्षा और गुणवत्ता हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है”—सुनने में मजबूत लगता है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत अक्सर इससे उलट नजर आती है।

कार्रवाई के नाम पर:

एक-दो ठेकेदार बदल दिए जाते हैं

जुर्माना लगाकर फाइल बंद कर दी जाती है

और कुछ दिन बाद वही शिकायतें फिर सामने आने लगती हैं


यह “रिएक्टिव सिस्टम” है, न कि “प्रोएक्टिव सुधार”।


असल समस्या कहाँ है?

1. आउटसोर्सिंग मॉडल – जिम्मेदारी कई स्तरों में बंट जाती है


2. रियल-टाइम मॉनिटरिंग की कमी


3. यात्रियों की शिकायतों का कमजोर फॉलोअप


4. जवाबदेही तय करने में ढीलापन



जब तक इन चार स्तंभों को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक हर जुर्माना सिर्फ एक “न्यूज़ हेडलाइन” बनकर रह जाएगा।


आगे का रास्ता: सिर्फ सख्ती नहीं, सिस्टम बदलना होगा

रेलवे को अब कुछ कड़े और स्थायी कदम उठाने होंगे:

हर ट्रेन में फूड क्वालिटी का लाइव ऑडिट सिस्टम

यात्रियों के लिए रीयल-टाइम शिकायत ट्रैकिंग

खराब सेवा पर ब्लैकलिस्टिंग की पारदर्शी प्रक्रिया

और सबसे जरूरी—जवाबदेही तय करने की स्पष्ट श्रृंखला



रेलवे की पटरियाँ सिर्फ शहरों को नहीं जोड़तीं, यह भरोसे को भी जोड़ती हैं।
लेकिन जब वही भरोसा खाने की एक थाली में टूटने लगे, तो मामला छोटा नहीं रहता।

“अपरिचित” फिल्म में सिस्टम को झकझोरने के लिए एक चरित्र सामने आया था।
असल जिंदगी में जरूरत है कि सिस्टम खुद ही अपने अंदर का ‘अपरिचित’ जगाए—
ताकि हर यात्री को यह महसूस हो कि उसकी सुरक्षा और सम्मान सिर्फ बयान नहीं, वास्तविक प्राथमिकता है।”

Amar Chouhan

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