रायगढ़ से वेल्लोर तक उम्मीद की यात्रा: डीएमडी से जूझते बच्चों के लिए जनसहयोग बना सहारा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़/वेल्लोर।
गंभीर और दुर्लभ बीमारियों की लड़ाई अक्सर सिर्फ अस्पतालों में नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता और सहयोग से भी लड़ी जाती है। इसका एक जीवंत उदाहरण हाल ही में सामने आया, जब छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से दो मासूम बच्चों को मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD) जैसी जटिल बीमारी के इलाज और जांच के लिए वेल्लोर भेजा गया।
ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) — एक ऐसा आनुवंशिक रोग, जो बचपन में ही धीरे-धीरे शरीर की मांसपेशियों को कमजोर कर देता है। पांच से सात वर्ष की उम्र में इसके लक्षण उभरने लगते हैं और समय के साथ यह चलने-फिरने से लेकर सांस लेने तक की क्षमता को प्रभावित करता है। ‘डायस्ट्रोफिन’ प्रोटीन की कमी से होने वाली इस बीमारी का अब तक कोई पूर्ण इलाज नहीं है, लेकिन समय पर जांच, दवाओं और थेरेपी से मरीजों का जीवन कुछ हद तक सहज बनाया जा सकता है।
इसी उम्मीद के साथ रायगढ़ के ऋषभ हंसराज (केलो विहार कॉलोनी) और सालोम अहिरवार (ग्राम सूपा) को समाजसेवी संस्था जनचेतना रायगढ़ और स्थानीय जनसहयोग के प्रयासों से क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC), वेल्लोर ले जाया गया। यहां 12 मार्च से 17 मार्च 2026 तक छह दिवसीय गहन जांच और स्वास्थ्य परीक्षण किया गया।

इस पूरी पहल के पीछे सिर्फ एक औपचारिक व्यवस्था नहीं, बल्कि संवेदनाओं से भरा प्रयास नजर आता है। आर्थिक सहयोग से लेकर बच्चों और उनके परिजनों की यात्रा, ठहरने और चिकित्सा व्यवस्था तक हर स्तर पर स्थानीय लोगों ने हाथ बढ़ाया।
संस्था से जुड़े राजेश त्रिपाठी, सविता रथ और पद्मनाभ प्रधान ने इस अभियान को जमीन पर उतारने में अहम भूमिका निभाई। वहीं, बच्चों के परिजन हेमंत हंसराज और श्याम अहिरवार भी इस दौरान लगातार साथ रहे।
वेल्लोर में आठ दिवसीय इस जांच एवं उपचार कार्यक्रम के बाद अब दोनों बच्चे अपने परिजनों के साथ 18 मार्च की रात ट्रेन से छत्तीसगढ़ लौट रहे हैं। इलाज की यह यात्रा भले ही लंबी हो, लेकिन इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि सामूहिक प्रयास से कठिन से कठिन राह भी आसान की जा सकती है।

स्थानीय स्तर पर यह पहल केवल दो बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि डीएमडी जैसी गंभीर बीमारी को लेकर जनजागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। जनचेतना रायगढ़ से जुड़े लोगों का कहना है कि आगे भी ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें बेहतर इलाज दिलाने के प्रयास जारी रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया है कि जब समाज संवेदनशील होता है, तो दुर्लभ बीमारियों से जूझते परिवारों के लिए उम्मीद की किरण खुद-ब-खुद जगमगा उठती है।
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