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चार पीढ़ियों से एक ही परिवार के हाथों में माता सेवा, मन्नत पूरी होने पर चढ़ता है चांदी का मुकुट और नैन

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घरघोड़ा की बहू के रूप में पूजी जाती हैं माँ बेगिन डोकरी, नवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब; संतान के जन्म से जुड़ी है विशेष लोकपरंपरा

रायगढ़। छत्तीसगढ़ की लोकआस्था में देवी-देवताओं के मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं, पारिवारिक विरासत और सामाजिक विश्वास के जीवंत केंद्र भी हैं। रायगढ़ जिले के घरघोड़ा विकासखंड में स्थित माँ बेगिन डोकरी का मंदिर भी ऐसा ही एक आस्था स्थल है, जहां देवी की महिमा के साथ स्थानीय लोकसंस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है। चारभांठा गांव की बेटी और घरघोड़ा की बहू के रूप में माता की मान्यता इस मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं में विशिष्ट पहचान देती है।

माता के दरबार से जुड़ी मान्यताएं, मन्नत पूरी होने पर चढ़ाई जाने वाली चांदी की भेंट और चार पीढ़ियों से एक ही परिवार द्वारा निभाई जा रही पुजारी की जिम्मेदारी इस मंदिर की खास पहचान हैं। नवरात्रि के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। रायगढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों और जशपुर जिले से भी बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं चांदी का मुकुट और नैन

माँ बेगिन डोकरी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था का एक विशेष रूप मन्नत पूरी होने के बाद की जाने वाली पूजा-अर्चना में दिखाई देता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भक्त माता से अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं और मनोकामना पूरी होने पर दरबार में पहुंचकर आभार व्यक्त करते हैं। इस दौरान नारियल, फूल-माला और अगरबत्ती के साथ श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य एवं श्रद्धा के अनुसार चांदी का मुकुट या चांदी के नैन यानी आंखें अर्पित करते हैं।

चांदी के इन प्रतीकात्मक चढ़ावों के पीछे भक्तों की अपनी-अपनी आस्था और विश्वास जुड़ा हुआ है। किसी के लिए यह मन्नत पूरी होने की खुशी है, तो किसी के लिए माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम। यही परंपरा समय के साथ मंदिर की विशिष्ट धार्मिक पहचान का हिस्सा बन गई है।

हालांकि, इन मान्यताओं को श्रद्धालुओं के धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। मंदिर से जुड़ी आस्था और परंपराएं इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं।

घरघोड़ा की बहू के रूप में पूजी जाती हैं माता

माँ बेगिन डोकरी के मंदिर की सबसे खास बात माता को लेकर प्रचलित वह लोकमान्यता है, जिसमें उन्हें चारभांठा गांव की बेटी और घरघोड़ा की बहू के रूप में देखा जाता है। इस मान्यता ने देवी की पूजा को स्थानीय सामाजिक जीवन और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ दिया है।

क्षेत्र में प्रचलित परंपरा के अनुसार, विवाह के बाद घरघोड़ा क्षेत्र की महिलाएं संतान के जन्म के पश्चात जब मायके या ससुराल आती-जाती हैं, तो माता के दरबार में हाजिरी लगाती हैं। इसे परिवार और बच्चों की सुख-समृद्धि तथा कुशलता की कामना से जुड़ी धार्मिक परंपरा माना जाता है।

स्थानीय महिलाओं के लिए यह केवल मंदिर में दर्शन करने की रस्म नहीं, बल्कि अपनी पारिवारिक परंपरा से जुड़े रहने का एक भावनात्मक अवसर भी है। विवाह, मातृत्व और बच्चों के कल्याण जैसे जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को माता के आशीर्वाद से जोड़कर देखने की यह परंपरा क्षेत्र की लोकसंस्कृति की झलक प्रस्तुत करती है।

बच्चों की कुशलता के लिए विशेष आस्था

माता के दरबार से जुड़ी एक अन्य मान्यता बच्चों की रक्षा और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना से संबंधित है। स्थानीय श्रद्धालु संतान के जन्म के बाद माता के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति और बच्चों की कुशलता की प्रार्थना करते हैं।

ऐसी परंपराएं छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में लोकदेवियों के प्रति गहरे विश्वास और पारिवारिक संस्कारों के साथ उनके जुड़ाव को दर्शाती हैं। माँ बेगिन डोकरी के मंदिर में भी यह आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती दिखाई देती है। परिवार के बड़े-बुजुर्ग जिस परंपरा को निभाते आए हैं, नई पीढ़ी भी उससे जुड़कर अपनी सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाती है।

नवरात्रि में बढ़ती है रौनक, दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु

चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं। इन दिनों माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। आसपास के गांवों के अलावा रायगढ़ और जशपुर जिले के विभिन्न क्षेत्रों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। नवरात्रि के अवसर पर मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल बन जाता है।

श्रद्धालुओं की आवाजाही, पूजा की तैयारियां और माता के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। स्थानीय लोगों के लिए नवरात्रि केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं से जुड़ने और सामूहिक आस्था को अभिव्यक्त करने का अवसर भी है।

मंदिर की लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए स्थानीय स्तर पर यह भी बताया जाता है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, पूर्व विधायक ओमप्रकाश राठिया, विधायक लालजीत राठिया और वर्तमान सांसद राधेश्याम राठिया सहित कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां माता के दर्शन के लिए आ चुकी हैं। हालांकि, इन यात्राओं की तिथियों और विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

चार पीढ़ियों से एक ही परिवार निभा रहा पुजारी की जिम्मेदारी

माँ बेगिन डोकरी मंदिर की पहचान केवल श्रद्धालुओं की आस्था तक सीमित नहीं है। यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी लंबे समय से एक ही परिवार के पास रहने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, पिछले चार पीढ़ियों से इस परिवार के सदस्य माता की सेवा करते आ रहे हैं।

वर्तमान पुजारी सिविल कुमार बैगा के अनुसार, उनसे पहले उनके दादा रायसिंह बैगा और फिर उनके पिता जग्गूराम बैगा ने माता की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाई। परिवार के माध्यम से आगे बढ़ी यह सेवा परंपरा आज भी जारी है।

ग्रामीण धार्मिक स्थलों पर पुजारी की भूमिका केवल नियमित पूजा कराने तक सीमित नहीं रहती। वह मंदिर से जुड़ी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में चार पीढ़ियों से एक ही परिवार का मंदिर की सेवा से जुड़े रहना स्थानीय धार्मिक विरासत की निरंतरता को दर्शाता है।

माता के प्रति बढ़ती श्रद्धा के साथ मंदिर की पहचान भी आसपास के अंचलों में मजबूत हुई है। श्रद्धालुओं के लिए यह दरबार मनोकामनाओं की प्रार्थना का स्थान है, जबकि स्थानीय समाज के लिए यह पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है।

लोकआस्था और परंपरा का जीवंत केंद्र

माँ बेगिन डोकरी का मंदिर घरघोड़ा क्षेत्र की उस धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को सामने लाता है, जहां देवी की आराधना सामाजिक जीवन और पारिवारिक संस्कारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। मन्नत पूरी होने पर चांदी का मुकुट और नैन अर्पित करने की परंपरा, संतान के जन्म के बाद माता के दर्शन की मान्यता और चार पीढ़ियों से जारी पुजारी परिवार की सेवा—ये सभी पहलू इस मंदिर को विशिष्ट बनाते हैं।

समय बदलने के साथ पूजा के तौर-तरीकों और सामाजिक जीवन में बदलाव आ सकता है, लेकिन लोकआस्था से जुड़ी ऐसी परंपराएं अपनी जड़ों को जीवित रखती हैं। माँ बेगिन डोकरी का दरबार इसी विश्वास का प्रतीक है, जहां श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं और स्थानीय समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाता है।

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Amar Chouhan

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