उद्घाटन से पहले ही भारतमाला हाईवे पर दरारों ने खोली गुणवत्ता की चिंता, अब 15 तकनीकी परीक्षणों से होगी निर्माण की पड़ताल

रायपुर-विशाखापट्टनम छह लेन सड़क पर उठे सवाल, NHAI की विभागीय और थर्ड पार्टी जांच शुरू; किसानों को खेत तक पहुंचने और विद्यार्थियों को स्कूल जाने के रास्ते की भी दरकार
रायपुर। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हो रहा रायपुर-विशाखापट्टनम भारतमाला हाईवे अपनी रफ्तार और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए जाना जाना चाहिए, लेकिन उद्घाटन से पहले ही सड़क पर दरारें दिखाई देने से निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं। कांकेर जिले में बासनवाही और मालवीपारा के आसपास सामने आई दरारों के बाद अब भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने जांच की प्रक्रिया तेज कर दी है। सड़क की अलग-अलग परतों से नमूने लेकर तकनीकी परीक्षण कराए जा रहे हैं। साथ ही, स्वतंत्र जांच के लिए थर्ड पार्टी की मदद भी ली गई है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि सड़क की सतह पर दरारें किन परिस्थितियों में आईं? क्या इसके पीछे निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, निर्धारित मोटाई में कमी, परतों के उचित कम्पैक्शन का अभाव, सड़क की संरचनात्मक क्षमता या पानी की निकासी से जुड़ी कोई समस्या है? फिलहाल इन सवालों का अंतिम जवाब जांच रिपोर्ट आने के बाद ही मिल सकेगा।
15 तरह के परीक्षणों से परखी जाएगी सड़क की मजबूती
प्रकाशित जानकारी के अनुसार, जांच के लिए सड़क के प्रभावित हिस्से से नमूने जुटाए गए हैं। करीब 15 प्रकार के परीक्षणों के माध्यम से सड़क की ऊपरी सतह से लेकर नीचे की परतों तक की गुणवत्ता का आकलन किया जाना है। दिल्ली मुख्यालय की टीम की भागीदारी के साथ स्वतंत्र प्रयोगशाला में भी नमूनों की जांच कराई गई है।
इन परीक्षणों का उद्देश्य केवल दरार वाले हिस्से की मरम्मत की पुष्टि करना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि सड़क निर्माण के दौरान निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन हुआ था या नहीं। हालांकि, सभी 15 परीक्षणों के नाम और उनके परिणाम अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए जांच पूरी होने से पहले किसी निर्माण एजेंसी को गुणवत्ता में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
किन तकनीकी जांचों से सामने आएगी निर्माण की हकीकत?
सड़क निर्माण की गुणवत्ता का आकलन कई स्तरों पर किया जाता है। इनमें प्रमुख परीक्षणों की भूमिका इस प्रकार है—
1. कोर कटिंग टेस्ट: सड़क की बनी हुई परत से नमूना निकालकर उसकी मोटाई और संरचना की जांच की जाती है। इससे पता चलता है कि बिटुमिनस परत निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
2. बिटुमिन कंटेंट टेस्ट: डामर मिश्रण में बिटुमिन की मात्रा निर्धारित अनुपात के अनुसार है या नहीं, इसकी पड़ताल की जाती है। मिश्रण में असंतुलन सड़क की टिकाऊ क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
3. एग्रीगेट ग्रेडेशन टेस्ट: निर्माण में इस्तेमाल गिट्टी और दूसरे कणों के आकार तथा उनके अनुपात की जांच होती है। सही मिश्रण सड़क की मजबूती के लिए आवश्यक है।
4. फील्ड डेंसिटी और कम्पैक्शन टेस्ट: सड़क के नीचे की मिट्टी और निर्माण की विभिन्न परतों को पर्याप्त रूप से दबाया गया है या नहीं, इसका आकलन किया जाता है। उचित कम्पैक्शन नहीं होने पर सड़क की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
5. फॉलिंग वेट डिफ्लेक्टोमीटर (FWD) टेस्ट: नियंत्रित भार डालकर सड़क में होने वाले झुकाव को मापा जाता है। इससे उसकी संरचनात्मक क्षमता और भार सहने की स्थिति का आकलन करने में मदद मिलती है।
6. रोड रफनेस टेस्ट: सड़क की सतह कितनी समतल है और उसमें कितना उतार-चढ़ाव है, इसका तकनीकी मापन किया जाता है।
इनके अलावा सड़क निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, विभिन्न परतों की गुणवत्ता, जल निकासी और संरचनात्मक मजबूती से संबंधित अन्य परीक्षण भी आवश्यकतानुसार किए जा सकते हैं। हालांकि, किसी विशेष परीक्षण के वास्तविक निष्कर्ष उसकी रिपोर्ट और निर्धारित तकनीकी मानकों से मिलान के बाद ही सामने आएंगे।
मरम्मत के बाद जांच, लेकिन जवाबदेही का सवाल बरकरार
प्रभावित हिस्से की सड़क को फिलहाल सुधार दिया गया है। NHAI ने निर्माण एजेंसी को नोटिस भी जारी किया है। विभागीय जांच और थर्ड पार्टी परीक्षण से अब यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दरारें आने का वास्तविक कारण क्या था और यदि निर्माण में कोई कमी पाई जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है।
सड़क की मरम्मत तत्काल यातायात संबंधी परेशानी को दूर कर सकती है, लेकिन उससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि मूल निर्माण में कोई खामी थी या नहीं। इसके लिए परीक्षण रिपोर्ट, निर्माण संबंधी अभिलेखों और निर्धारित गुणवत्ता मानकों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होगा।
NHAI के धमतरी परियोजना कार्यान्वयन इकाई (PIU) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर शमशेर सिंह के अनुसार, बासनवाही-मालवीपारा के आसपास दरार वाले हिस्से से नमूने लिए गए हैं। विभागीय जांच के साथ थर्ड पार्टी से भी परीक्षण कराया जा रहा है। उनके मुताबिक, प्रभावित सड़क की मरम्मत कर दी गई है।
हाईवे बना, लेकिन किसानों के खेतों तक पहुंचने का रास्ता कहां?
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सड़क परियोजनाओं की सफलता केवल तेज यातायात और बेहतर कनेक्टिविटी से नहीं मापी जा सकती। परियोजना के आसपास रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का समाधान भी उतना ही जरूरी है।
रायपुर-विशाखापट्टनम हाईवे के निर्माण से प्रभावित मालवीपारा पंचायत के कुछ किसानों ने खेतों तक पहुंचने का रास्ता बाधित होने की समस्या उठाई है। किसान उत्तम साहू, देवेंद्र नेताम और लोखनाथ मंडावी के अनुसार, हाईवे बनने के बाद खेतों तक पहुंचने में परेशानी हो रही है।
ग्रामीणों के लिए यह महज आवागमन का सवाल नहीं है। खेती-किसानी के काम में समय पर खेत पहुंचना, कृषि उपकरण ले जाना और उपज को बाहर निकालना बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि संपर्क मार्ग बाधित हो जाए, तो उसका सीधा असर किसानों की दिनचर्या और कृषि कार्यों पर पड़ सकता है।
इसलिए संबंधित अधिकारियों के सामने सड़क की गुणवत्ता की जांच के साथ-साथ किसानों के लिए वैकल्पिक या स्थायी पहुंच मार्ग की व्यवस्था सुनिश्चित करने की चुनौती भी है।
स्कूल की व्यवस्था को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता
स्थानीय स्तर पर शिक्षा से जुड़ी समस्या भी सामने आई है। गांव के पूर्व उपसरपंच हनुमान पांडेय के मुताबिक, हाईवे के दूसरी ओर हाईस्कूल स्थित है और स्कूल के लिए नई जमीन तलाश की गई है। ग्रामीणों ने नए शैक्षणिक सत्र से पहले स्कूल की व्यवस्था करने की मांग रखी थी।
यह मामला बताता है कि बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं के निर्माण के दौरान स्थानीय संपर्क मार्गों, विद्यार्थियों की सुरक्षित आवाजाही और सार्वजनिक सुविधाओं की निरंतरता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। स्कूल तक पहुंचने के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना संबंधित विभागों और प्रशासन के समन्वय से जुड़ा विषय है।
हालांकि, स्कूल की मौजूदा व्यवस्था, वैकल्पिक भूमि और निर्माण की वर्तमान स्थिति के संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
4,146 करोड़ रुपये की परियोजना, निगरानी पर भी उठे सवाल
उपलब्ध प्रकाशित विवरण के मुताबिक, रायपुर-विशाखापट्टनम छह लेन हाईवे की छत्तीसगढ़ में लंबाई लगभग 125 किलोमीटर बताई गई है और इसकी लागत करीब 4,146 करोड़ रुपये है। इतनी बड़ी परियोजना से लोगों को बेहतर सड़क, कम यात्रा समय और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद रहती है।
ऐसे में निर्माण के शुरुआती चरण में ही दरारें दिखाई देना स्वाभाविक रूप से गुणवत्ता निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन इन सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और तकनीकी निष्कर्षों से ही संभव है।
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सड़क का संबंधित हिस्सा किस निर्माण पैकेज के अंतर्गत आता है, निर्माण और गुणवत्ता परीक्षण की जिम्मेदारी किस एजेंसी की थी तथा निर्धारित मानकों के अनुरूप निगरानी की गई थी या नहीं।
अब जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
इस पूरे मामले में आगे की कार्रवाई तीन प्रमुख बिंदुओं पर निर्भर करेगी—दरारों का तकनीकी कारण, निर्माण मानकों के अनुपालन की स्थिति और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया। यदि परीक्षण में निर्माण संबंधी कमी सामने आती है, तो अनुबंध की शर्तों के अनुसार सुधारात्मक कार्रवाई और जवाबदेही तय करने का सवाल उठेगा। यदि दरारों के पीछे अन्य कारण मिलते हैं, तो उनके अनुरूप समाधान करना होगा।
साथ ही, किसानों के खेतों तक पहुंच और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित स्कूल मार्ग जैसे स्थानीय मुद्दों पर भी ठोस कार्रवाई जरूरी है।
फिलहाल सड़क की मरम्मत हो चुकी है, लेकिन मामले की वास्तविक तस्वीर जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी। अब निगाहें इस बात पर हैं कि तकनीकी जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक होते हैं या नहीं और उनसे सामने आने वाली कमियों पर जिम्मेदार विभाग किस तरह कार्रवाई करते हैं।
(संपादकीय टिप्पणी: यह समाचार उपलब्ध प्रकाशित जानकारी और संबंधित अधिकारी के कथन पर आधारित है। जांच के अंतिम निष्कर्ष सामने आने तक निर्माण में तकनीकी खामी या किसी पक्ष की जिम्मेदारी को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।)
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