Latest News

दीपावली की उत्पत्ति पर इतिहास और मान्यताओं की अलग-अलग दलीलें, आखिर कब और कैसे शुरू हुआ रोशनी का यह पर्व?

http://amarkhabar.com

भगवान राम की अयोध्या वापसी से लेकर भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा तक जुड़ी हैं दीपावली की परंपराएं, जैन और बौद्ध इतिहासकारों ने भी प्रस्तुत किए अलग-अलग दृष्टिकोण; तमिलनाडु के ऐतिहासिक अभिलेखों में त्योहार के उल्लेख को लेकर शोधकर्ताओं के बीच मतभेद

विशेष रिपोर्ट | संस्कृति एवं इतिहास

भारत में दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़ा ऐसा पर्व है, जिसकी चमक सदियों से भारतीय जनमानस में बनी हुई है। घरों में जलते दीपक, रोशनी से सजे बाजार, मिठाइयों की खुशबू, नए कपड़ों की खरीदारी और परिवार के साथ उत्सव मनाने की परंपरा इस पर्व को विशेष बनाती है। लेकिन जब सवाल उठता है कि आखिर दीपावली की शुरुआत कब हुई और इसे पहली बार किसने मनाया, तो इसका जवाब किसी एक कहानी या एक ऐतिहासिक घटना तक सीमित नहीं रह जाता।

दीपावली की उत्पत्ति को लेकर भारतीय समाज में कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। उत्तर भारत में इसे भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की खुशी से जोड़कर देखा जाता है। दक्षिण भारत में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की कथा प्रचलित है। वहीं जैन धर्म में यह पर्व भगवान महावीर के निर्वाण से जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर, कुछ बौद्ध विचारकों और इतिहासकारों ने दीपावली की प्राचीनता को बौद्ध परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया है।

इन अलग-अलग मान्यताओं के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या दीपावली की शुरुआत किसी एक धार्मिक घटना से हुई थी या समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों की परंपराएं मिलकर आज के व्यापक दीपोत्सव का स्वरूप बनीं?

अयोध्या में दीप जलाने की परंपरा और भगवान श्रीराम की वापसी

उत्तर भारत में दीपावली से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यता रामायण की कथा पर आधारित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापसी की थी। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सजाया और उत्सव मनाया।

इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष कार्तिक अमावस्या को दीप जलाकर दीपावली मनाने की परंपरा प्रचलित हुई, ऐसा धार्मिक विश्वास है।

इस कथा में दीपक केवल प्रकाश का माध्यम नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि उत्तर भारत में दीपावली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भगवान श्रीराम से गहराई से जुड़ा हुआ है।

हालांकि, इस मान्यता को धार्मिक परंपरा के रूप में समझना चाहिए। इसे दीपावली की ऐतिहासिक शुरुआत का निर्णायक प्रमाण मानने के लिए अलग से ऐतिहासिक साक्ष्यों की आवश्यकता होगी।

दक्षिण भारत में नरकासुर वध की कथा से जुड़ी दीपावली

दक्षिण भारत में दीपावली का एक प्रमुख धार्मिक आधार भगवान श्रीकृष्ण और नरकासुर की कथा है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार नरकासुर नामक असुर ने अपने अत्याचारों से लोगों को परेशान कर रखा था। उसके आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध किया। नरकासुर के अंत के बाद लोगों ने प्रसन्नता व्यक्त की और इस विजय की स्मृति में उत्सव मनाया।

दक्षिण भारत के कई हिस्सों में नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने, नए कपड़े पहनने, पूजा करने और पकवान बनाने की परंपरा रही है।

इस प्रकार एक ही दीपोत्सव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग पौराणिक घटनाओं और धार्मिक मान्यताओं के साथ विकसित हुआ।

बौद्ध परंपरा से दीपावली को जोड़ने वाले पंडित अयोथीदासर का तर्क

दीपावली की उत्पत्ति को लेकर एक अलग दृष्टिकोण तमिलनाडु के सामाजिक चिंतक और बौद्ध विचारक पंडित अयोथीदासर ने प्रस्तुत किया था।

बीबीसी की रिपोर्ट में उनके 13 नवंबर 1907 को प्रकाशित लेख ‘दीपावती स्नानावरम’ का उल्लेख किया गया है। इस लेख में उन्होंने दीपावली को बौद्ध परंपरा से जुड़ा पर्व बताया था।

अयोथीदासर के अनुसार, प्राचीन समय में लोग कार्तिक महीने की चतुर्दशी को विशेष स्नान, नए वस्त्र धारण करने, पकवान बनाने और जरूरतमंदों को भोजन कराने जैसी परंपराओं के साथ मनाते थे।

उनका दावा था कि जब देश में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था, तब यह उत्सव समाज के विभिन्न वर्गों में प्रचलित था। बाद के समय में इसकी मूल परंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों को भुला दिया गया तथा इसके साथ असुर वध की पौराणिक कथा जोड़ दी गई।

हालांकि, अयोथीदासर का यह दृष्टिकोण उनका ऐतिहासिक-सामाजिक मत था। इसे दीपावली की बौद्ध उत्पत्ति का सर्वमान्य या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

जैन धर्म में भगवान महावीर के निर्वाण से जुड़ा है दीपोत्सव

दीपावली के इतिहास को समझने के लिए जैन धर्म की परंपरा भी महत्वपूर्ण है।

जैन मान्यता के अनुसार, 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने बिहार के पावापुरी में कार्तिक अमावस्या के दिन निर्वाण प्राप्त किया था। जैन परंपरा में इस घटना का विशेष महत्व है।

जैन साहित्य और परंपरा से जुड़े इतिहासकार माइलाई सीनी वेंकटसामी ने दीपावली को भगवान महावीर के निर्वाण से संबंधित पर्व के रूप में समझाया है।

इस मान्यता के अनुसार, भगवान महावीर के निर्वाण के बाद उनके ज्ञान और उपदेशों की स्मृति में लोगों ने दीप जलाए। इस तरह दीप प्रज्ज्वलन की परंपरा जैन समुदाय में धार्मिक स्मरण और श्रद्धा का प्रतीक बनी।

जैन समाज आज भी दीपावली को भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में विशेष श्रद्धा के साथ मनाता है। इस अवसर पर पूजा, धार्मिक पाठ और निर्वाण लाडू चढ़ाने की परंपरा भी प्रचलित है।

इससे स्पष्ट होता है कि दीपावली का महत्व केवल एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग धर्मों ने इसे अपनी आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुरूप अपनाया है।

क्या प्राचीन तमिल साहित्य में दीपावली का उल्लेख नहीं मिलता था?

दीपावली की ऐतिहासिक प्राचीनता को लेकर तमिलनाडु के कुछ शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

बीबीसी की रिपोर्ट में शोधकर्ता प्रोफेसर वेल्सामी के विचारों का उल्लेख है। उनके अनुसार, तमिल साहित्य में 19वीं सदी तक दीपावली का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।

उन्होंने 1732 में प्रकाशित तमिल शब्दकोश ‘सदुरकरादी’ का उदाहरण दिया है। उनके मुताबिक, इस शब्दकोश में दीपावली शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। वहीं 1842 में श्रीलंका में प्रकाशित ‘मानिप्पाय तमिल’ शब्दकोश में दीपावली शब्द और उससे संबंधित पौराणिक व्याख्याएं मिलने की बात कही गई है।

इस आधार पर उनका मानना है कि संभव है कि तमिल समाज में दीपावली का व्यापक प्रचलन अपेक्षाकृत बाद के समय में बढ़ा हो।

सांस्कृतिक शोधकर्ता परमशिवन ने भी तमिलनाडु की पारंपरिक त्योहार संस्कृति के संदर्भ में इस विषय को उठाया है। उनके अनुसार, वहां के अनेक पारंपरिक उत्सव कृषि चक्र और स्थानीय मौसम के अनुरूप आयोजित होते थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान स्वरूप में दीपावली का व्यापक प्रसार विजयनगर शासनकाल में तेलुगु भाषी समुदायों और ब्राह्मणों के माध्यम से तमिलनाडु में हुआ।

हालांकि, किसी शब्दकोश या साहित्यिक रचना में किसी त्योहार का उल्लेख नहीं मिलना अपने आप में इस बात का अंतिम प्रमाण नहीं है कि उस समय वह त्योहार अस्तित्व में ही नहीं था। इसके लिए अभिलेखों, धार्मिक ग्रंथों, स्थानीय परंपराओं और अन्य ऐतिहासिक स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

क्या दीपावली समय के साथ अलग-अलग परंपराओं का साझा उत्सव बनी?

दीपावली के इतिहास से जुड़ी विभिन्न मान्यताओं का अध्ययन करने पर एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। भारत में त्योहारों का स्वरूप हमेशा एक जैसा नहीं रहा। अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विश्वास, स्थानीय रीति-रिवाज, सामाजिक परिस्थितियां और सांस्कृतिक प्रभाव समय के साथ एक-दूसरे से जुड़े हैं।

संभव है कि दीपावली के वर्तमान स्वरूप के निर्माण में भी ऐसी अनेक परंपराओं की भूमिका रही हो।

हिंदू परंपरा में भगवान श्रीराम की वापसी और भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध की कथाएं प्रमुख हैं। जैन धर्म में भगवान महावीर के निर्वाण का महत्व है। वहीं कुछ बौद्ध चिंतकों ने इसके पीछे बौद्ध परंपरा की ऐतिहासिक भूमिका होने का दावा किया है।

इन सभी दृष्टिकोणों को सामने रखते हुए यह कहना अधिक उचित होगा कि दीपावली की उत्पत्ति को लेकर एक सर्वमान्य ऐतिहासिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है। इसके अलग-अलग धार्मिक और क्षेत्रीय स्वरूपों का विकास एक लंबी सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

इतिहास की बहस से आगे है दीपावली का सामाजिक संदेश

दीपावली की शुरुआत को लेकर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन आज इस पर्व का सामाजिक स्वरूप कहीं अधिक व्यापक है।

यह त्योहार परिवारों को एक साथ लाता है। लोग पुराने मतभेद भुलाकर एक-दूसरे से मिलते हैं, घरों की सफाई करते हैं, जरूरतमंदों की सहायता करते हैं और खुशियां बांटते हैं।

दीप जलाने की परंपरा को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश धार्मिक सीमाओं से आगे जाकर मानवीय जीवन से भी जुड़ता है।

लोक संस्कृति के शोधकर्ता शिवसुब्रमणियम का भी यही दृष्टिकोण रहा है कि जब लोग किसी त्योहार को खुशी और उत्साह के साथ मनाते हैं, तब उसकी उत्पत्ति को लेकर होने वाली बहस के कारण लोगों की खुशियों को कम नहीं किया जाना चाहिए। जिसे त्योहार मनाना अच्छा लगता है, वह मनाए और जिसे नहीं मनाना है, वह अपनी इच्छा के अनुसार रहे।

निष्कर्षतः, दीपावली कब शुरू हुई, इसका कोई एक निर्विवाद ऐतिहासिक वर्ष या प्रमाणित संस्थापक सामने नहीं आता। लेकिन इतना स्पष्ट है कि सदियों के दौरान इस पर्व ने भारतीय समाज के अलग-अलग धार्मिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय समुदायों में अपनी जगह बनाई है। इसकी असली पहचान आज केवल धार्मिक मान्यता में नहीं, बल्कि प्रकाश, सद्भाव, पारिवारिक एकता और खुशियां बांटने की परंपरा में भी दिखाई देती है।

अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️

See also  नाबालिग घरेलू सहायिका से बार-बार दुष्कर्म करने वाला सरकारी शिक्षक गिरफ्तार, पुलिस ने घर से दबोचा<br><br>

Amar Chouhan

AmarKhabar.com एक हिन्दी न्यूज़ पोर्टल है, इस पोर्टल पर राजनैतिक, मनोरंजन, खेल-कूद, देश विदेश, एवं लोकल खबरों को प्रकाशित किया जाता है। छत्तीसगढ़ सहित आस पास की खबरों को पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़ पोर्टल पर प्रतिदिन विजिट करें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button