बजरमुड़ा भू-अर्जन घोटाला: कार्रवाई से पहले ‘औपचारिकता’ क्यों?—सस्पेंड एसडीएम पर विभागीय जांच, FIR अब भी लंबित

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित बजरमुड़ा भूमि अधिग्रहण प्रकरण में एक बार फिर प्रशासनिक नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य शासन ने तत्कालीन एसडीएम अशोक मार्बल के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश तो जारी कर दिए हैं, लेकिन अब तक आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) द्वारा प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने से कार्रवाई की दिशा और गति दोनों पर संदेह गहराने लगा है।
मामला उस भू-अर्जन से जुड़ा है, जो छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी (CSPGCL) को आवंटित गारे पेलमा सेक्टर-3 कोल ब्लॉक के लिए किया गया था। प्रारंभिक जांच में मुआवजा निर्धारण में व्यापक अनियमितताएं सामने आई थीं, जिनमें जमीन की प्रकृति बदलकर दिखाना, परिसंपत्तियों का बढ़ा-चढ़ाकर मूल्यांकन और रिकॉर्ड में हेरफेर जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। इसके बावजूद आपराधिक कार्रवाई की दिशा में ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया जाना कई तरह के सवाल खड़े करता है।
जांच रिपोर्ट में साफ उल्लेख है कि असिंचित भूमि को सिंचित बताकर मुआवजा राशि बढ़ाई गई। पेड़ों की संख्या वास्तविक से अधिक दर्शाई गई, टिन शेड को पक्का निर्माण बताकर भुगतान किया गया और कुएं, बरामदे व पोल्ट्री फार्म जैसी संरचनाओं का मूल्यांकन मनमाने ढंग से किया गया। इन अनियमितताओं के कारण सरकारी कंपनी को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
सूत्रों के मुताबिक, बजरमुड़ा, मिलूपारा, करवाही, खम्हरिया और ढोलनारा गांवों में कुल 449.166 हेक्टेयर क्षेत्र में लीज स्वीकृत हुई थी। इनमें से 170 हेक्टेयर भूमि के लिए ही करीब 415.69 करोड़ रुपए का मुआवजा दिया गया, जो अब जांच के दायरे में है। राज्य स्तरीय टीम ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से अनियमितताओं की पुष्टि करते हुए दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की अनुशंसा की थी।
इसके बावजूद, अब तक केवल विभागीय जांच का आदेश जारी होना और FIR का लंबित रहना, प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर प्रश्नचिह्न लगाता है। खासतौर पर तब, जब इसी प्रकरण में शासन पहले ही संबंधित अधिकारी को निलंबित कर चुका है।
चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि जिस भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में गड़बड़ियों की पुष्टि हो चुकी है, उसी क्षेत्र में खनिज विभाग द्वारा भू-प्रवेश की अनुमति भी दे दी गई। लगभग 108 हेक्टेयर क्षेत्र में यह अनुमति ऐसे समय दी गई, जब मुआवजा निर्धारण पर सवाल कायम हैं। इससे यह आशंका भी बलवती होती है कि जांच और प्रशासनिक निर्णय समानांतर लेकिन असंगत दिशा में चल रहे हैं।
इस पूरे मामले में केवल एक अधिकारी तक जिम्मेदारी सीमित नहीं दिखती। जांच के दायरे में तत्कालीन तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, उद्यानिकी विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। कई से पूछताछ जारी है, जबकि कुछ सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा तेज है कि जब जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी प्रमाणित हो चुकी है और मामला एसीबी-ईओडब्ल्यू तक पहुंच चुका है, तो FIR दर्ज करने में देरी क्यों हो रही है। क्या यह केवल प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर किसी बड़े नाम के उजागर होने का डर?
फिलहाल, विभागीय जांच के आदेश से यह जरूर संकेत मिलता है कि शासन दबाव में है, लेकिन असली कसौटी तब होगी जब इस प्रकरण में आपराधिक जिम्मेदारी तय कर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई जाएगी। रायगढ़ के इस बहुचर्चित मामले में अब सबकी निगाहें EOW की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️