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650 मीटर की ‘मौत वाली सड़क’ पर फूटा गुस्सा: चक्काजाम के बाद झुका प्रशासन, लिखित आश्वासन पर खत्म हुआ आंदोलन

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com

रायगढ़/लैलूंगा, 13 जुलाई 2026।
बरसों से अधूरी पड़ी सड़क आखिरकार जनआक्रोश की वजह बन ही गई। लैलूंगा से बाकारूमा के बीच करीब 600–650 मीटर अधूरी सड़क ने रविवार को ऐसा हालात बना दिए कि लोगों को सड़क पर उतरकर चक्काजाम करना पड़ा। पूर्व भाजपा नेता रवि भगत के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन तब जाकर थमा, जब प्रशासन को मौके पर पहुंचकर लिखित आश्वासन देना पड़ा।

एडीबी प्रोजेक्ट बना अधूरी कहानी

बताया जा रहा है कि यह सड़क एडीबी (ADB) परियोजना के तहत बनाई जानी थी, लेकिन निजी जमीन के भू-अर्जन में लापरवाही के कारण काम बीच में ही छोड़ दिया गया। नतीजा—सिर्फ 600 मीटर का टुकड़ा आज पूरे मार्ग पर भारी पड़ रहा है।
बरसात आते ही राजपुर बाजार के पास यह हिस्सा दलदल में तब्दील हो जाता है, जिससे आम लोगों का चलना तक मुश्किल हो गया है।

जनता सड़कों पर, प्रशासन बैकफुट पर

लगातार अनदेखी से नाराज ग्रामीणों और युवाओं ने रविवार को चक्काजाम कर दिया। आंदोलन की अगुवाई कर रहे रवि भगत ने साफ कहा कि—

> “जब तक ठोस निर्णय नहीं होगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।”



स्थिति बिगड़ती देख एसडीएम राकेश वर्मा और पीडब्ल्यूडी के अधिकारी मौके पर पहुंचे। पहले मौखिक आश्वासन दिया गया, लेकिन आंदोलनकारियों ने लिखित भरोसा मांगा। आखिरकार पीडब्ल्यूडी एसडीओ को लिखित आश्वासन देना पड़ा, तब जाकर जाम खुल सका।

फंड स्वीकृत, फिर भी सड़क अधूरी क्यों?

प्रशासन ने बताया कि—

₹85 लाख मुआवजा राशि जमा कर दी गई है, जो भू-स्वामियों को दी जानी है

DMF से ₹1.32 करोड़ की स्वीकृति भी मिल चुकी है

टेंडर प्रक्रिया जारी है


सवाल यही है—जब पैसा भी है और योजना भी, तो फिर सड़क अब तक अधूरी क्यों?

आदिवासी अंचलों की बदहाली उजागर

यह मामला सिर्फ एक सड़क तक सीमित नहीं है। लैलूंगा जैसे आदिवासी ब्लॉकों में—

खराब सड़कें

कोयला ढुलाई से बिगड़ता ढांचा

स्कूलों में शिक्षकों की कमी

अस्पतालों में डॉक्टरों का अभाव


जैसी समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं।

राजनीति से अलग, अब ‘जनहित’ की लड़ाई

भाजपा छोड़ने के बाद रवि भगत अब खुलकर आदिवासी क्षेत्रों के मुद्दों पर मुखर नजर आ रहे हैं। इस आंदोलन ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में जनहित के मुद्दों पर संघर्ष और तेज हो सकता है।


सीधा सवाल:
जब योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, तो ज़मीन पर काम अधूरा क्यों रह जाता है?
लैलूंगा-बाकारूमा की यह सड़क सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की जिंदा मिसाल बन चुकी है।

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Amar Chouhan

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