प्रशासनिक लकवे का शिकार लैलूंगा-बाकारुमा मार्ग: कागजी घोड़े दौड़ाने वाले अफसर कुंभकर्णी नींद में, क्या किसी बड़े हादसे के बाद जागेगा अमला?

मुख्य प्रहार:
दावे स्मार्ट पुलिसिंग के, लेकिन लाइफलाइन बन चुकी सड़क पर रेंग रही जनता; मानसून की पहली बारिश ने खोली विकास की पोल।
मुआवजे और कोर्ट का रोना रोकर जिम्मेदारी से भाग रहे लोक निर्माण विभाग (PWD) के आला अधिकारी।
युवा नेता रवि भगत का अल्टीमेटम: 12 जुलाई को चक्काजाम, जनता सिखाएगी सोए हुए तंत्र को सबक।
लैलूंगा/रायगढ़। रायगढ़ जिला प्रशासन एक तरफ जहां आधुनिकता का ढोल पीट रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि जिले के नागरिक आज भी ‘आदिम युग’ जैसी बदहाल सड़कों पर चलने को मजबूर हैं। लैलूंगा विधानसभा क्षेत्र की लाइफलाइन माना जाने वाला लैलूंगा-बाकारुमा मार्ग आज प्रशासन की घोर लापरवाही और कंगाली का जीता-जागता सबूत बन चुका है। राजपुर बाजार (बस स्टैंड से मंडी तक) का पूरा हिस्सा एक खौफनाक दलदल में तब्दील हो चुका है, जहां गाड़ियां नहीं, बल्कि आम जनता की सहूलियतें और प्रशासनिक दावे धंस रहे हैं।
कागजी बहानों की आड़ में कछुआ चाल, जनता बेहाल
जब-जब इस सड़क के निर्माण या मरम्मत की मांग उठती है, तब-तब वातानुकूलित कमरों में बैठे लोक निर्माण विभाग (PWD) और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के नुमाइंदे मुआवजे और न्यायालयीन प्रकरणों का ‘घिसा-पिटा’ बहाना आगे कर देते हैं।
सीधा सवाल: क्या इन बहानों से जनता की मुश्किलें कम हो जाएंगी? मानसून की महज शुरुआती बारिश ने सड़क को जो जख्म दिए हैं, उसने साफ कर दिया है कि बारिश से पहले किए जाने वाले प्रशासनिक रखरखाव (Maintenance) के नाम पर केवल कागजी लीपापोती की गई थी।
रात के अंधेरे में महाजाम: अगर एम्बुलेंस फंस गई, तो हत्या का मुकदमा किस पर होगा?
शनिवार रात राजपुर बाजार में जो मंजर देखने को मिला, वह प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। ट्रकों, यात्री बसों और दोपहिया वाहनों का ऐसा महाजाम लगा कि लोग कीचड़ और अंधेरे के बीच घंटों तड़पते रहे। स्थानीय निवासी कन्हैया दास महंत ने वीडियो जारी कर सोए हुए तंत्र को जगाने की कोशिश की, लेकिन प्रशासनिक अमले के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
आदिवासी नेता रवि भगत ने प्रशासन की रीढ़ पर प्रहार करते हुए बेहद वाजिब सवाल उठाया है— “अगर इस दलदल और जाम में कोई गंभीर मरीज जिंदगी और मौत से जूझती एम्बुलेंस में फंस गया, या किसी गरीब के बच्चे की परीक्षा छूट गई, तो क्या लैलूंगा का प्रशासनिक अमला इसकी जिम्मेदारी अपने सिर लेगा?”
औद्योगिक क्षेत्र से करोड़ों का राजस्व, बदले में जनता को सिर्फ ‘कीचड़’
तमनार-लैलूंगा का यह क्षेत्र भारी औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। यहां से सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का माइनिंग और कमर्शियल टैक्स जाता है। इसके बावजूद, इस मार्ग पर चलने वाले किसानों, व्यापारियों, स्कूली बच्चों और आम राहगीरों को बुनियादी सड़क तक नसीब नहीं है। भारी मालवाहक गाड़ियां इस दलदल को और गहरा कर रही हैं, और जिम्मेदार अधिकारी दफ्तरों में बैठकर ‘सब ठीक है’ का चश्मा पहने हुए हैं।
12 जुलाई का चक्काजाम: अब आर-पार की लड़ाई
प्रशासन के इस अड़ियल और संवेदनहीन रवैए के खिलाफ अब जनता का सब्र का बांध टूट चुका है। रवि भगत के नेतृत्व में 12 जुलाई को प्रस्तावित चक्काजाम प्रशासन की इसी कुंभकर्णी नींद को तोड़ने का आखिरी जरिया है।
अब देखना यह होगा कि हमेशा ‘जांच और प्रस्ताव’ का लॉलीपॉप थमाने वाला रायगढ़ जिला प्रशासन इस चक्काजाम से पहले कोई ठोस और त्वरित कदम उठाता है, या फिर हमेशा की तरह किसी बड़ी दुर्घटना या जनहानि का इंतजार करता रहेगा।
(अमरखबर – जमीनी हकीकत के साथ)
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