“रायगढ़ पर औद्योगिक विस्तार का नया दबाव: रुंगटा परियोजना से विकास बनाम पर्यावरण की जंग तेज, 50 मेगावाट पावर प्लांट पर 20 गांवों में सवाल”

Journalist Amardeep chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़।
जिले के गढ़उमरिया–दर्रामुड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित एकीकृत इस्पात एवं फेरो अलॉय परियोजना ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस को केंद्र में ला खड़ा किया है। मेसर्स रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा करीब 814.5 करोड़ रुपये की लागत से मौजूदा इकाई के विस्तार का प्रस्ताव रखा गया है, जिसमें न केवल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की योजना है, बल्कि 50 मेगावाट के कैप्टिव पावर प्लांट की स्थापना भी शामिल है।
कागजों में यह परियोजना क्षेत्रीय औद्योगिक विकास की दिशा में बड़ा कदम बताई जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव को लेकर ग्रामीण इलाकों में आशंका और विरोध दोनों तेजी से उभर रहे हैं।
परियोजना का स्वरूप और विस्तार
दस्तावेजों के अनुसार वर्तमान में लगभग 2.513 हेक्टेयर में संचालित इकाई को बढ़ाकर 11.029 हेक्टेयर तक विस्तारित किया जाएगा। प्रस्तावित संयंत्र में
2.145 लाख टन प्रतिवर्ष डीआरआई (स्पंज आयरन)
2.24 लाख टन स्टील मेल्टिंग शॉप
2 लाख टन रोलिंग मिल
42,900 टन फेरो अलॉय उत्पादन
200 टन प्रतिदिन सिंटर प्लांट
मेटल रिकवरी एवं रीहीटिंग यूनिट
जैसी औद्योगिक गतिविधियां शामिल हैं।
यह पूरा औद्योगिक ढांचा राष्ट्रीय राजमार्ग-49 के समीप स्थापित किया जाना प्रस्तावित है, जो परिवहन और लॉजिस्टिक्स की दृष्टि से अनुकूल माना जा रहा है।
ग्रामीणों की चिंता: ‘पहले से बोझिल, अब और कितना?’
रायगढ़ जिला पहले से ही स्टील, स्पंज आयरन और ताप विद्युत संयंत्रों के कारण प्रदूषण संबंधी शिकायतों के लिए चर्चित रहा है। ऐसे में एक और बड़े औद्योगिक विस्तार ने स्थानीय आबादी को चिंतित कर दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि डीआरआई, स्टील मेल्टिंग और फेरो अलॉय इकाइयां अत्यधिक प्रदूषणकारी मानी जाती हैं, जिनसे निकलने वाले
धूलकण
फ्लाई ऐश
धात्विक कण
औद्योगिक अपशिष्ट
स्थानीय पर्यावरण और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर डाल सकते हैं।
कई ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में पहले से सांस और त्वचा संबंधी बीमारियों के मामले बढ़े हैं, और नई परियोजना से यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
जल, जमीन और जनस्वास्थ्य पर उठे सवाल
परियोजना के सार्वजनिक होने के बाद सबसे अधिक सवाल जल उपयोग को लेकर उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि
प्रतिदिन जल की खपत कितनी होगी?
क्या भूजल दोहन बढ़ेगा?
राख और स्लैग का निपटान कैसे होगा?
इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर अब तक सामने नहीं आए हैं। कृषि पर निर्भर ग्रामीणों को आशंका है कि जलस्तर गिरने और प्रदूषण बढ़ने से उनकी आजीविका प्रभावित हो सकती है।
जनसुनवाई: औपचारिकता या निर्णायक मंच?
प्रस्तावित परियोजना को लेकर अब निगाहें आगामी जनसुनवाई पर टिकी हैं। गांवों में लगातार बैठकें हो रही हैं और लोग अपने सवालों और आपत्तियों को व्यवस्थित तरीके से रखने की तैयारी कर रहे हैं।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनसुनवाई महज एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे
पर्यावरणीय जोखिम
जल संसाधन
कृषि सुरक्षा
जनस्वास्थ्य
जैसे मुद्दों पर खुली और पारदर्शी चर्चा का मंच बनना चाहिए।
कंपनी का पक्ष: विकास और रोजगार का दावा
दूसरी ओर, कंपनी के पर्यावरणीय दस्तावेजों में दावा किया गया है कि इस परियोजना से
आधुनिक औद्योगिक ढांचा विकसित होगा
स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा
क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी
साथ ही प्रदूषण नियंत्रण, हरित पट्टी विकास और पर्यावरण प्रबंधन के उपायों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि इन दावों की वास्तविकता का आकलन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बाद ही संभव होगा।
निष्कर्ष: संतुलन की चुनौती
रायगढ़ में प्रस्तावित यह परियोजना केवल एक औद्योगिक विस्तार भर नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है जिसमें विकास, पर्यावरण और जनजीवन के बीच संतुलन तलाशना जरूरी हो जाता है।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह परियोजना क्षेत्र के लिए अवसर बनती है या फिर एक नया विवाद—लेकिन फिलहाल इतना तय है कि रायगढ़ की धरती पर औद्योगिक दबाव और जनचिंता दोनों अपने चरम की ओर बढ़ रहे हैं।
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