फोरलेन मुआवजे में ‘कोटवारी जमीन’ का खेल? पंडरीपानी में रिकॉर्ड हेरफेर से करोड़ों के घोटाले की आशंका

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 26 मई 2026।
डिग्री कॉलेज से महापल्ली तक प्रस्तावित फोरलेन परियोजना अब विकास से ज्यादा विवादों के घेरे में दिखाई दे रही है। ताज़ा खुलासों में ग्राम पंडरीपानी की कोटवारी भूमि को लेकर गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं, जहां शासकीय जमीन को कथित रूप से एक निजी संस्था के नाम दर्ज कर मुआवजे का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
दस्तावेज़ों के अनुसार, हल्का नंबर 00038 के अंतर्गत खसरा नंबर 115, रकबा 2.8490 हेक्टेयर भूमि, जो नियमानुसार कोटवारी मद में शासकीय दर्ज होनी चाहिए थी, उसे राजस्व अभिलेखों में “रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी” के नाम भूमिस्वामी के रूप में अंकित कर दिया गया है। यही एंट्री अब मुआवजा प्रकरण का आधार बन रही है।
नियम क्या कहते हैं, और सवाल कहाँ खड़े हैं
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 183 स्पष्ट करती है कि कोटवारी भूमि शासकीय संपत्ति होती है। कोटवार की मृत्यु के बाद यह भूमि स्वतः शासन के अधीन चली जाती है। ऐसे में किसी निजी संस्था के नाम इस प्रकार की भूमि का दर्ज होना नियमों के विपरीत माना जाता है।
यहीं से पूरे प्रकरण पर सवाल उठने लगे हैं—
क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सुनियोजित हेरफेर?
क्या मुआवजे के लिए जानबूझकर रिकॉर्ड बदले गए?
मुआवजे की बड़ी तस्वीर
डिग्री कॉलेज से महापल्ली तक प्रस्तावित 12 किलोमीटर लंबे फोरलेन प्रोजेक्ट में लगभग 45 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण होना है। कुल मुआवजा राशि 80 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। ऐसे में जमीन के स्वामित्व में छोटी सी गड़बड़ी भी बड़े आर्थिक लाभ का माध्यम बन सकती है।
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि संबंधित कोटवार की मृत्यु लगभग एक दशक पहले हो चुकी है और तब से उक्त जमीन पर सोसायटी का कब्जा है। आरोप यह भी है कि पटवारी और राजस्व निरीक्षक स्तर पर रिकॉर्ड सुधारने की बजाय सोसायटी के पक्ष में प्रविष्टि कर दी गई।
अंदरूनी असहमति, बाहर खामोशी
सूत्र बताते हैं कि कुछ राजस्व कर्मचारियों ने इस प्रविष्टि पर आपत्ति दर्ज कर शासन के पक्ष में नामांतरण की अनुशंसा की थी, लेकिन उच्च स्तर पर इसे अनसुना कर दिया गया। यदि यह सही है, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
पटवारी का पक्ष
क्षेत्रीय पटवारी उपेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि संबंधित भूमि “सेवा भूमि” के रूप में पहले से सोसायटी के नाम दर्ज चली आ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपने प्रपत्रों में इस स्थिति का उल्लेख वरिष्ठ अधिकारियों को कर दिया है, जबकि मुआवजा प्रकरण की जानकारी से उन्होंने अनभिज्ञता जताई।
जांच की मांग तेज
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि शासन को सीधे आर्थिक नुकसान पहुंचाने की साजिश भी हो सकती है।
स्थानीय स्तर पर अब इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो रही है। जानकार मानते हैं कि यदि गहराई से पड़ताल की जाए, तो इससे जुड़े और भी तथ्य सामने आ सकते हैं।
फिलहाल, फोरलेन परियोजना के बहाने जमीन और मुआवजे का यह मामला एक बड़े सवाल के रूप में खड़ा है—क्या विकास की राह में नियमों को दरकिनार किया जा रहा है, या यह सिर्फ एक प्रशासनिक भूल है? जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
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