दलदल ने ली एक और नन्हे गजराज की जान: हफ्ते भर में दूसरी मौत से वन प्रबंधन पर गहराते सवाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
धरमजयगढ़ (रायगढ़)।
जिले के धरमजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत छाल रेंज एक बार फिर सुर्खियों में है। महज एक सप्ताह के भीतर शावक हाथी की दूसरी मौत ने वन विभाग की सतर्कता और जमीनी तैयारियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला छाल बीट के तरेकेला गांव के समीप केराझरिया डेम (511 आरएफ क्षेत्र) का है, जहां दलदल में फंसने से एक शावक हाथी की मौत हो गई।
सूचना मिलते ही वन अमला मौके पर पहुंचा और आवश्यक औपचारिकताएं शुरू कीं, लेकिन इस बीच इलाके में लगभग 35 हाथियों का दल अब भी विचरण कर रहा है। इससे न सिर्फ ग्रामीणों में दहशत का माहौल है, बल्कि वन विभाग के सामने चुनौती भी कम नहीं है। सुरक्षा के मद्देनजर विभाग ने निगरानी बढ़ाने की बात कही है, मगर स्थानीय लोग इसे नाकाफी मान रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र लंबे समय से हाथियों की आवाजाही के लिहाज से संवेदनशील बना हुआ है। इसके बावजूद न तो पर्याप्त निगरानी की गई और न ही ऐसे संभावित खतरनाक स्थानों—जैसे दलदली इलाके या गहरे जलाशयों—को चिन्हित कर सुरक्षा उपाय किए गए। उनका आरोप है कि यदि समय रहते एहतियात बरते जाते, तो एक और नन्हे गजराज की जान बचाई जा सकती थी।

गौरतलब है कि इससे ठीक पहले, बीते शुक्रवार को छाल रेंज के सिंघीझाप डेम में डूबने से भी एक शावक हाथी की मौत हुई थी। लगातार दो घटनाओं ने वन विभाग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ रहा है और वे मामले की निष्पक्ष जांच के साथ जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
उधर, वन विभाग का कहना है कि दोनों घटनाओं की जांच की जा रही है और हाथियों के दल की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका के बीच अब सवाल यह उठने लगे हैं कि क्या विभाग केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होता है, या फिर पहले से ठोस रोकथाम की रणनीति भी मौजूद है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि संवेदनशील वन क्षेत्रों में निगरानी तंत्र को और मजबूत करने के साथ-साथ जोखिम वाले स्थानों की समय रहते पहचान और सुरक्षा क्यों नहीं सुनिश्चित की जाती। फिलहाल, छाल रेंज में पसरा सन्नाटा और ग्रामीणों के बीच फैली दहशत, दोनों ही वन प्रबंधन की चुनौतियों की कहानी बयां कर रहे हैं।