16 साल से अटकी जमीन की कीमत: कुर्मीभौना, पोरडी और पोरडा के ग्रामीणों ने मुआवजा और अधिकारों के लिए खोला मोर्चा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
घरघोड़ा (रायगढ़) — विकास परियोजनाओं के नाम पर जमीन देने वाले ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। ग्राम कुर्मीभौना, पोरडी और पोरडा के सैकड़ों प्रभावित परिवारों ने एस.ई.सी.एल. द्वारा वर्षों से लंबित भू-अर्जन प्रक्रिया के खिलाफ एकजुट होकर ज्ञापन सौंपा है। ग्रामीणों का आरोप है कि 2008-09 से शुरू हुई यह प्रक्रिया आज 2026 तक भी पूरी नहीं हो पाई है, जबकि इस बीच उनकी जमीन, घर और जीवन—तीनों अनिश्चितता में झूलते रहे।
ग्रामीणों की सबसे बड़ी आपत्ति मुआवजे की गणना को लेकर है। उनका कहना है कि जमीन का मूल्यांकन 2010 के बाजार भाव से किया जा रहा है, जबकि भुगतान 2026 में होने की संभावना है। ऐसे में 16 वर्षों का अंतराल अपने आप में बड़ा अन्याय है। ग्रामीणों ने स्पष्ट मांग रखी है कि इस अवधि के लिए 12 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज जोड़कर ही मुआवजा दिया जाए, ताकि उन्हें वास्तविक मूल्य मिल सके।
मकानों और परिसंपत्तियों के मामले में भी स्थिति कम विवादित नहीं है। जहां एक ओर पहले टाइल्स युक्त मकानों को सर्वसुविधायुक्त मानकर लगभग 11,923 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर तय की गई थी, वहीं अब सर्वे टीम उसे घटाकर करीब 8,903 रुपये प्रति वर्गमीटर मानने की बात कर रही है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि पहले से स्वीकृत दरों को ही लागू किया जाए और दुकानों व कार्यालयों के लिए भी निर्धारित दरों का पालन किया जाए।
रोजगार के मुद्दे पर भी असंतोष साफ झलकता है। प्रशासन द्वारा 25 दिसंबर 2010 के पहले जन्मे सदस्यों को ही पात्र मानने का प्रावधान ग्रामीणों को स्वीकार्य नहीं है। उनका तर्क है कि जब सर्वे और प्रक्रिया 2026 तक जारी है, तो इस अवधि तक बालिग हुए सभी परिवारजन रोजगार और विस्थापन लाभ के हकदार होने चाहिए।
इसके अलावा ग्रामीणों ने आबादी भूमि, वन अधिकार पट्टा, फलदार व इमारती पेड़ों, तथा शेड निर्माण जैसी परिसंपत्तियों का समुचित मुआवजा देने की भी मांग उठाई है। उनका कहना है कि कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद भी यदि उन्हें न्यायोचित लाभ नहीं मिलता, तो यह उनके साथ दोहरी मार होगी—एक ओर जमीन छिनना और दूसरी ओर उचित मुआवजा न मिलना।
ग्रामीणों ने प्रशासन को 45 दिनों की समयसीमा देते हुए चेतावनी भी दी है कि यदि इस अवधि में उनकी मांगों का निराकरण नहीं हुआ, तो वे पुरानी भू-अर्जन प्रक्रिया को निरस्त कर नई नीति के तहत पुनः प्रक्रिया शुरू करने की मांग करेंगे।
यह मामला केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि विश्वास और न्याय का भी है। अब देखना होगा कि प्रशासन और एस.ई.सी.एल. ग्रामीणों की इस सामूहिक आवाज को कितनी गंभीरता से लेते हैं।
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