“विकास की राख में दबी सांसें: गेरवानी में जनसुनवाई से पहले उबलता जनाक्रोश”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
जिले का औद्योगिक नक्शा जितनी तेजी से फैल रहा है, उतनी ही तेजी से यहां की हवा, पानी और मिट्टी जहरीली होती जा रही है। विकास के नाम पर खड़े किए गए विशाल कारखानों की चिमनियों से उठता धुआं अब सिर्फ आसमान ही नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और भविष्य को भी ढक चुका है। ऐसे हालात में गेरवानी स्थित शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड के प्रस्तावित क्षमता विस्तार के लिए 21 अप्रैल 2026 को होने वाली जनसुनवाई ने पूरे इलाके को उबाल पर ला दिया है।
यह महज एक औपचारिक जनसुनवाई नहीं, बल्कि उस पीड़ा का विस्फोट बनने जा रही है, जो वर्षों से ग्रामीणों के भीतर सुलग रही है।
लाखा, चिराईपानी, पाली, देलारी, सराईपाली, जीवरी, गेरवानी, शिवपुरी, भेलवाटिकरा, बरलिया, छिरभौना, बरपाली और तराईमाल—इन गांवों की गलियों में इन दिनों सिर्फ एक ही चर्चा है—“अब और नहीं।” चौपालों में बैठकों का दौर जारी है, तो घरों के आंगन में महिलाओं के समूह भी खुलकर विरोध की रणनीति बुन रहे हैं। यह विरोध अचानक नहीं है, बल्कि उस लाचारी और घुटन की उपज है, जिसे लोगों ने सालों तक चुपचाप सहा।
गेरवानी-सराईपाली क्षेत्र आज जिले का सबसे प्रदूषित इलाका बन चुका है। यहां की हवा में जहर घुल चुका है, पानी पीने लायक नहीं रहा, और ध्वनि प्रदूषण ने मानसिक शांति तक छीन ली है। चौबीसों घंटे उड़ती फ्लाई ऐश, सड़कों पर धूल का गुबार, और मशीनों की कर्कश आवाजें—यहां का जीवन अब किसी सजा से कम नहीं लगता। लोग कहते हैं कि यह “आधुनिक काला पानी” है, जहां सजा तो है, पर कोई अपराध नहीं।
कभी विकास के सपनों में अपनी पुश्तैनी जमीनें सौंप देने वाले ग्रामीण आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्हें स्कूल, अस्पताल और रोजगार के सपने दिखाए गए थे, लेकिन बदले में मिला बीमार शरीर, प्रदूषित पर्यावरण और अनिश्चित भविष्य। अब उन्हें यह समझ में आ चुका है कि ‘विकास’ के नाम पर जो सुनहरी तस्वीर दिखाई गई थी, वह दरअसल मृग-मरीचिका थी।
ऐसे में शांभवी इस्पात का प्रस्तावित विस्तार लोगों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि वर्तमान हालात में ही जीना दूभर है, अगर उद्योग का विस्तार हुआ तो हालात और भयावह हो जाएंगे। उनके मन में एक ही सवाल है—“क्या हमारी जिंदगी की कोई कीमत नहीं?”
गांवों में चल रही बैठकों में अब सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एकजुटता भी साफ दिखाई दे रही है। लोग तय कर चुके हैं कि इस बार वे किसी भी बहकावे, लालच या दबाव में नहीं आएंगे। उन्हें इस बात का भी अंदेशा है कि जनसुनवाई के दौरान साम, दाम, दंड और भेद—हर हथकंडा अपनाया जा सकता है। लेकिन इस बार ग्रामीणों का मनोबल पहले से कहीं ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या लोकतंत्र में वास्तव में जनता की आवाज सुनी जाती है, या फिर फैसले पहले ही तय हो चुके होते हैं? क्या जनसुनवाई महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है, जहां कागजों पर सहमति दिखाई जाती है और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है?
अब निगाहें 21 अप्रैल पर टिकी हैं। यह दिन सिर्फ एक कंपनी के विस्तार का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि इस इलाके में आगे सांसें बचेंगी या सिर्फ धुआं।
लड़ाई साफ है—एक तरफ जीवन और पर्यावरण, दूसरी तरफ मुनाफा और प्रदूषण।
अब देखना यह है कि इस जंग में आखिर जीत किसकी होती है।
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