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डिजिटल ठगी के खिलाफ ‘खौफ’ की पटकथा: जब पुलिस कप्तान बने जागरूकता के नायक

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

घरघोड़ा। बदलते दौर में अपराध का चेहरा भी तेजी से बदल रहा है—अब बंदूक नहीं, मोबाइल और इंटरनेट के जरिए आमजन को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे समय में रायगढ़ जिले के एसएसपी शशि मोहन सिंह ने एक अलग रास्ता चुना है—कानून की किताबों से आगे बढ़कर कैमरे के जरिए जन-जागरूकता की मुहिम।

इसी सोच का परिणाम है शॉर्ट फिल्म “खौफ दा डिजिटल वार”, जिसका घरघोड़ा स्थित ए.के. सिनेमा में निशुल्क प्रदर्शन किया गया। यह सिर्फ एक फिल्म स्क्रीनिंग नहीं, बल्कि साइबर अपराधों के खिलाफ सामूहिक चेतना जगाने का प्रयास बनकर सामने आया। सैकड़ों की संख्या में पहुंचे दर्शकों ने न केवल फिल्म देखी, बल्कि उसके संदेश को गंभीरता से आत्मसात किया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्वयं एसएसपी शशि मोहन सिंह उपस्थित रहे, जबकि भाजपा जिला अध्यक्ष अरुणधर दीवान ने अध्यक्षता की। प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्र के कई प्रमुख चेहरे—तहसीलदार मनोज कुमार गुप्ता, एसडीओपी सिद्धार्थ तिवारी, थाना प्रभारी कुमार गौरव साहू सहित जनप्रतिनिधि, पत्रकार, शिक्षक, छात्र और स्थानीय नागरिक—इस पहल के साक्षी बने।

फिल्म की खासियत इसकी सादगी और सटीकता में छिपी है। इसमें साइबर ठगी के उन तरीकों को दिखाया गया है, जिनका सामना आम लोग रोजमर्रा में कर रहे हैं—फर्जी कॉल, ओटीपी फ्रॉड, लिंक स्कैम और सोशल मीडिया के जरिए जालसाजी। इन घटनाओं को इतनी सहजता से प्रस्तुत किया गया कि दर्शक खुद को कहानी से जुड़ा महसूस करने लगे। यही कारण रहा कि फिल्म खत्म होने के बाद भी चर्चा का सिलसिला देर तक चलता रहा।

सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि इस फिल्म में एसएसपी शशि मोहन सिंह ने केवल निर्देशन ही नहीं किया, बल्कि एक सशक्त किरदार में नजर भी आए। उनकी यह ‘हीरो’ वाली भूमिका दर्शकों को खासा प्रभावित करती दिखी—जहां एक पुलिस अधिकारी स्क्रीन पर भी उसी दृढ़ता के साथ खड़ा नजर आया, जैसी उम्मीद लोग वास्तविक जीवन में करते हैं।

प्रदर्शन के बाद लोगों ने खुलकर इस पहल की सराहना की। जनप्रतिनिधियों ने इसे “समय की मांग” बताया तो आम दर्शकों ने इसे “जरूरी जागरूकता” का सशक्त माध्यम माना। भाजपा जिलाध्यक्ष अरुणधर दीवान ने भी कहा कि यह फिल्म डिजिटल युग के खतरों को समझाने का प्रभावी जरिया है, जो समाज को सतर्क बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।

यह पहला अवसर नहीं है जब एसएसपी सिंह ने इस तरह की रचनात्मक पहल की हो। इससे पहले मानव तस्करी जैसे गंभीर विषय पर उनकी फिल्म “कजरी” भी चर्चा में रही थी। साफ है कि वे पुलिसिंग को केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि समाज के साथ संवाद का एक नया माध्यम भी गढ़ रहे हैं।

खुद एसएसपी सिंह ने भी लोगों से अपील की कि वे इस फिल्म को अपने परिवार और परिचितों तक पहुंचाएं, ताकि साइबर अपराधों के खिलाफ एक मजबूत जागरूकता श्रृंखला तैयार हो सके।

दरअसल, “खौफ दा डिजिटल वार” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें पुलिस और समाज के बीच दूरी कम करने की कोशिश दिखाई देती है। जब कानून का रखवाला ही जागरूकता का नायक बनकर सामने आए, तो संदेश कहीं ज्यादा प्रभावी हो जाता है—और शायद यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है।

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Amar Chouhan

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