“बोनस की कतार में बुझ गई जिंदगी: धरमजयगढ़ में बैंक लाइन बनी बुजुर्ग किसान की आख़िरी मंज़िल, सवालों के घेरे में व्यवस्था”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
धरमजयगढ़/रायगढ़।
जिस किसान की मेहनत से खेतों में हरियाली आती है और घर-घर में अन्न पहुंचता है, उसी अन्नदाता की जिंदगी आज अपनी ही कमाई के कुछ हजार रुपये निकालने की जद्दोजहद में खत्म हो जाए—यह दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोर देने के लिए काफी है। रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ में धान बोनस की राशि निकालने बैंक पहुंचे एक बुजुर्ग किसान की लाइन में खड़े-खड़े मौत हो जाने की घटना ने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि उन राजनीतिक वादों की भी याद दिला दी है जो चुनावी मंचों से किसानों को सुनाए गए थे।
यह घटना धरमजयगढ़ ब्लॉक के सलका गांव के बुजुर्ग किसान जीयतराम से जुड़ी है। गुरुवार की सुबह वे अपने धान बोनस की राशि निकालने के लिए अपेक्स बैंक पहुंचे थे। सुबह का वक्त था, लेकिन बैंक के बाहर पहले से ही किसानों की लंबी कतार लग चुकी थी। धान बेचने के बाद मिलने वाली बोनस राशि किसानों के लिए महज पैसा नहीं होती, बल्कि आने वाले महीनों की उम्मीद और जरूरतों का सहारा होती है। इसी उम्मीद के साथ जीयतराम भी लाइन में लग गए।
लेकिन बैंक की व्यवस्था किसानों की संख्या के सामने बेहद छोटी साबित हो रही थी। सैकड़ों किसानों की भीड़ और सिर्फ एक चालू काउंटर—यह तस्वीर बताने के लिए काफी है कि हालात कितने अव्यवस्थित थे। किसान सुबह से लाइन में खड़े थे, कोई धूप से बचने के लिए गमछा सिर पर रखे था तो कोई जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहा था।
इसी भीड़ और इंतजार के बीच सुबह करीब नौ बजे अचानक जीयतराम की तबीयत बिगड़ गई। चक्कर आने के बाद वे लाइन में ही गिर पड़े। आसपास मौजूद किसानों ने तुरंत उन्हें संभालने की कोशिश की, पानी पिलाया, लेकिन कुछ ही क्षणों में यह स्पष्ट हो गया कि अब वे इस दुनिया में नहीं रहे।
जिस बैंक से वे अपने मेहनत के पैसों की उम्मीद लेकर आए थे, उसी बैंक की कतार उनकी जिंदगी की आखिरी मंज़िल बन गई।

घटना की खबर मिलते ही परिवार के लोग पहुंचे और अपने बुजुर्ग को घर ले गए—बिना पैसे के, लेकिन हमेशा के लिए टूटे हुए दिल के साथ।
चुनावी वादों पर फिर उठे सवाल
यह घटना सिर्फ एक किसान की मौत की खबर नहीं है। यह उस सवाल को भी सामने लाती है जो चुनावों के दौरान किसानों से किए गए वादों को लेकर बार-बार उठता है।
चुनाव से पहले जारी किए गए घोषणा पत्र में यह कहा गया था कि किसानों को लंबी कतारों से राहत देने के लिए पंचायत भवनों में ही नकद भुगतान की व्यवस्था की जाएगी, ताकि उन्हें बैंक की भीड़ और परेशानी का सामना न करना पड़े।
अगर यह व्यवस्था जमीन पर लागू हुई होती, तो शायद सलका गांव के जीयतराम को धरमजयगढ़ के बैंक तक आने की जरूरत ही नहीं पड़ती। गांव के पंचायत भवन में ही भुगतान मिल जाता और शायद आज उनकी जिंदगी भी बची होती।

विपक्ष ने सरकार को घेरा
घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। कांग्रेस के जिला प्रवक्ता तारेंद्र डनसेना ने इस घटना को सरकार की नीतियों की विफलता बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि जिस “सुशासन” का दावा किया जाता है, उसी व्यवस्था में एक बुजुर्ग किसान अपने ही पैसे के लिए लाइन में खड़े-खड़े जान गंवा देता है।
उनका कहना है कि किसानों को पहले खाद के लिए भटकना पड़ता है, फिर धान बेचने के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है और अब बोनस निकालने के लिए भी घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ रहा है।
प्रशासन के लिए चेतावनी
धरमजयगढ़ की यह घटना प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। धान खरीदी और बोनस भुगतान के समय हर साल बैंक शाखाओं में भीड़ बढ़ती है, यह कोई नई बात नहीं है। इसके बावजूद अगर व्यवस्थाएं नहीं सुधरतीं, अतिरिक्त काउंटर नहीं खोले जाते और किसानों के लिए अलग व्यवस्था नहीं की जाती, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी दोहराई जा सकती हैं।
अंत में सवाल वही
जीयतराम अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत कई सवाल छोड़ गई है—
क्या किसानों को अपने ही पैसे के लिए इस तरह संघर्ष करना पड़ेगा?
क्या चुनावी वादे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या एक किसान की जिंदगी की कीमत इतनी कम हो गई है कि वह बैंक की लाइन में खड़े-खड़े खत्म हो जाए?
धरमजयगढ़ की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें अन्नदाता आज भी अपने हक के लिए कतारों में खड़ा है—कभी खाद के लिए, कभी धान बेचने के लिए और कभी अपने ही पैसे के लिए।