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गरीब की मौत, सिस्टम का तमाशा: खरसिया कस्टोडियल डेथ में न्याय की शर्मनाक परिभाषा (देखें वीडियो)

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

NH-49 पर आक्रोश, प्रशासन की ‘चालाकी’

रायगढ़। खरसिया थाना क्षेत्र में घटित कस्टोडियल डेथ ने प्रशासन और न्याय व्यवस्था की वास्तविकता को बेनकाब कर दिया है।
परसकोल के रमेश चौहान की मौत ब्रेन हेमरेज से हुई, और प्रत्यक्षदर्शियों व परिजनों का आरोप है कि पुलिस की थर्ड डिग्री ने उनकी जान ले ली।

लेकिन प्रशासन ने दोषियों पर FIR दर्ज करने के बजाय दो आरक्षकों को ‘लाइन अटैच’ कर दिया और पीड़ित परिवार को ‘कलेक्टर दर’ की नौकरी का आश्वासन देकर मामला ठंडा कर दिया।

सवाल: क्या किसी की जान लेने का जवाब केवल दफ्तर बदलने और नौकरी के वादों से दिया जा सकता है?

कलेक्टर दर: न्याय का ‘लॉलीपॉप’

पीड़ित परिवार को दी गई दैनिक वेतन भोगी नौकरी, न्याय की जगह सिस्टम की चालाकी साबित होती है।

सोचने योग्य सवाल:

क्या एक गरीब की जिंदगी की कीमत सिर्फ चंद हजार रुपये की संविदा नौकरी हो सकती है?

क्या प्रशासन ने अपनी साख बचाने के लिए गरीब परिवार की मजबूरी का फायदा उठाया?

विधायक की मध्यस्थता: समझौते का खेल

जब NH-49 पर हजारों लोग सड़क पर उतर आए और घंटों का चक्काजाम किया, जनता को उम्मीद थी कि दोषियों को जेल भेजा जाएगा।

लेकिन बंद कमरे की बातचीत का नतीजा:

असली दोषियों पर FIR दर्ज नहीं।

केवल ‘लाइन अटैच’ का रास्ता अपनाया गया।

न्याय के बजाय समझौता और व्यवस्था की बची-खुची इज्जत को प्राथमिकता।


सवाल: क्या गरीब की जान की कीमत सत्ता और सिस्टम के खेल के आगे तिल-तिल कर मापी जा रही है?

न्यायिक जांच: पुरानी रस्म

भीड़ को शांत करने के लिए प्रशासन ने न्यायिक जांच का पुराना पैंतरा अपनाया। पांच नाम मांगे गए।

जानकार बताते हैं:

यह केवल मामला ठंडा करने की रस्म है।

ऐसी जांचें अक्सर सालों फाइलों में दबी रहती हैं।

वास्तविक न्याय की संभावना बेहद कम।


सवाल: क्या न्याय गरीब और अमीर दोनों के लिए समान रूप से तेज़ और निष्पक्ष है?

सिस्टम की चालाकी और गरीब की जान

NH-49 पर यातायात बहाल हो गया, चक्काजाम खुल गया, नारेबाजी थम गई।
लेकिन रायगढ़ की जनता के मन में सवाल अभी भी जिंदा है:
“अगर मरने वाला कोई रसूखदार परिवार का होता, तो क्या न्याय का तराजू इसी तरह झुकता?”



मुख्य तथ्य

दोषी हत्या का आरोप, पर सजा सिर्फ ‘लाइन अटैच’
मुआवजा 1 करोड़ की मांग के बदले ‘कलेक्टर दर’ की नौकरी
जांच मजिस्ट्रियल जांच का वादा, सालों खिंच सकती है
परिणाम गरीब की जान पर प्रशासन की साख बची

गरीब की जान पर सिस्टम की चाल

सत्ता की मध्यस्थता और सिस्टम की चालाकी ने एक गरीब की मौत को महज ‘लाइन अटैच’ और ‘कलेक्टर दर’ के सौदे में दफन कर दिया।

खरसिया कस्टोडियल डेथ सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, यह उस व्यवस्था का प्रतिबिंब है:

जो गरीबों की जिंदगी की कीमत तिल-तिल मापती है

और न्याय की प्रक्रिया को ढोंगी ढाल बना देती है।


अंतिम सवाल: अगर न्याय इसी तरह चलता रहा, तो गरीब की जान की कीमत और अमीर की जिंदगी के मूल्य में असमानता का यह सिलसिला कब तक चलेगा?

Amar Chouhan

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