राजनांदगांव जिला न्यायालय को बम से उड़ाने की धमकी:सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलती घटना, प्रशासनिक तैयारियों पर उठे गंभीर सवाल

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिला न्यायालय को बम से उड़ाने की धमकी ने न केवल न्यायालय परिसर में अफरा-तफरी मचा दी, बल्कि जिला न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था और स्थानीय शासन-प्रशासन की तैयारियों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक ई-मेल के जरिए दी गई धमकी के बाद आनन-फानन में कोर्ट परिसर खाली कराया गया और आम नागरिकों व अधिवक्ताओं का प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया।
जानकारी के अनुसार, जिला न्यायालय की आधिकारिक ई-मेल आईडी पर दोपहर 1 बजकर 20 मिनट पर अज्ञात व्यक्ति द्वारा बम धमाके की धमकी भेजी गई। मेल सामने आते ही न्यायिक अधिकारियों और प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। इसके बाद पुलिस बल, बम स्क्वॉड और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा परिसर में सघन तलाशी अभियान शुरू किया गया।
सवालों के घेरे में न्यायालय की सुरक्षा व्यवस्था
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि—
क्या जिला न्यायालय जैसी संवेदनशील जगहों की साइबर और भौतिक सुरक्षा पर्याप्त है?
क्या कोर्ट की आधिकारिक ई-मेल आईडी की निगरानी और साइबर ऑडिट नियमित रूप से की जाती है?
धमकी मिलने से पहले कोई अर्ली-वार्निंग सिस्टम क्यों सक्रिय नहीं था?
जिला न्यायालय वह स्थान है, जहां रोज़ाना सैकड़ों वकील, पक्षकार, आम नागरिक और न्यायिक अधिकारी आते-जाते हैं। ऐसे में एक साधारण ई-मेल के जरिए सुरक्षा तंत्र को हिला देना, प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी को उजागर करता है।
प्रशासनिक सक्रियता—घटना के बाद, पहले क्यों नहीं?
धमकी के बाद पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा का मौके पर पहुंचना, अतिरिक्त बल की तैनाती और सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करना निश्चित रूप से सराहनीय कदम हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि— क्या प्रशासन की भूमिका केवल “घटना के बाद प्रतिक्रिया” तक ही सीमित रहनी चाहिए?
यदि न्यायालय परिसर पहले से ही उच्च सुरक्षा श्रेणी में आता है, तो फिर ऐसी धमकी के बाद ही सुरक्षा व्यवस्था को सख्त करने की जरूरत क्यों पड़ी? यह दर्शाता है कि निवारक सुरक्षा (Preventive Security) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
स्थानीय शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी
इस घटना ने स्थानीय प्रशासन, पुलिस और न्यायिक प्रशासन के बीच समन्वय की कमी को भी उजागर किया है। जिला स्तर पर—
नियमित मॉक ड्रिल
साइबर थ्रेट असेसमेंट
न्यायालय परिसरों की सुरक्षा समीक्षा
जैसे उपाय यदि समय-समय पर किए जाते, तो शायद इस तरह की धमकी से उत्पन्न अफरा-तफरी को रोका जा सकता था।
जनता का भरोसा दांव पर
न्यायालय केवल इमारत नहीं, बल्कि न्याय और सुरक्षा का प्रतीक होता है। जब उसी स्थान की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो आम जनता का भरोसा भी डगमगाता है। यह घटना चेतावनी है कि यदि समय रहते सुरक्षा खामियों को नहीं सुधारा गया, तो भविष्य में कोई शरारती तत्व इस तरह की धमकी को हकीकत में बदलने की कोशिश भी कर सकता है।
अब आगे क्या?
इस मामले में केवल धमकी देने वाले की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि—
जिला न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक ऑडिट हो
साइबर सुरक्षा को मजबूत किया जाए
स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय की जाए
ताकि न्यायालय परिसर न केवल कानून का मंदिर बने रहें, बल्कि आम नागरिक खुद को वहां सुरक्षित भी महसूस कर सकें।
यह घटना एक स्पष्ट संदेश है—
सुरक्षा में छोटी-सी चूक भी बड़े खतरे का कारण बन सकती है।