रात के अंधेरे में गाँव वाले बाइक से भगा रहे हाथी, लापरवाही: कापू रेंज में ग्रामीण खुद संभाल रहे जंगल का मोर्चा

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम धरमजयगढ़।
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ वन मंडल अंतर्गत कापू रेंज इन दिनों भय और लापरवाही के खतरनाक संगम से गुजर रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जंगल से सटे गांवों में रहने वाले ग्रामीणों को अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ रही है, क्योंकि जिस विभाग की जिम्मेदारी वन्यजीवों और इंसानों के बीच संतुलन बनाए रखने की है, वही विभाग संकट की घड़ी में मैदान से नदारद नजर आ रहा है।
7 जनवरी की रात कापू रेंज के गोलाबुड़ा गांव में एक विशालकाय हाथी अचानक गांव की सीमा में आ धमका। रात का सन्नाटा था, लोग अपने घरों में थे, तभी हाथी की आहट से पूरे गांव में दहशत फैल गई। ग्रामीण जानते थे कि यदि हाथी गांव में देर तक रुका, तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है। मदद के लिए वन विभाग को फोन किए गए, लेकिन न तो कोई मैदानी कर्मचारी मौके पर पहुंचा और न ही कॉल का जवाब मिला।
मजबूरी में ग्रामीणों ने खुद ही हाथी को गांव से दूर भगाने की कोशिश शुरू कर दी। इसी दौरान एक युवक मोटरसाइकिल से हाथी को खदेड़ने लगा—एक ऐसा दृश्य, जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाएं। हाथी ने अचानक पलटकर युवक को दौड़ा लिया। सौभाग्य से युवक जान बचाने में सफल रहा, लेकिन यह हादसा यह बताने के लिए काफी है कि एक पल की चूक मौत का कारण बन सकती थी।
विडंबना यह है कि सरकार हाथी-मानव संघर्ष रोकने के नाम पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर रही है—हाथी ट्रैकिंग, अलर्ट सिस्टम, जागरूकता अभियान और विशेष दस्ता—सब कागजों में मौजूद हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब हाथी गांव की ओर बढ़ते हैं, तब वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी घर में आराम फरमाते हैं, और भय के साये में जी रहे ग्रामीणों की कॉल उठाना भी जरूरी नहीं समझते।
गोलाबुड़ा का यह मामला कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक खतरनाक चलन बनता जा रहा है। कई बार वन विभाग की निष्क्रियता से नाराज ग्रामीणों ने हाथी पर हमला तक कर दिया, जिससे हाथी और इंसान—दोनों की जान गई। यह संघर्ष किसी एक पक्ष की हार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रमाण है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ग्रामीणों को यह तक जानकारी नहीं दी जाती कि हाथी के पास जाना कितना जानलेवा हो सकता है। यदि समय पर वन विभाग का अमला पहुंचता, तो ग्रामीणों को समझाइश दी जाती, सुरक्षित दूरी बनवाई जाती और किसी को जान जोखिम में डालने की नौबत ही न आती।
अब सवाल सीधा है—
क्या हाथी केवल फाइलों में सुरक्षित हैं?
क्या ग्रामीणों की जान की कीमत सिर्फ आंकड़ों तक सीमित है?
यदि वास्तव में हाथी और इंसान—दोनों की सुरक्षा सरकार और वन विभाग की प्राथमिकता है, तो रात के समय सक्रिय गश्त, त्वरित प्रतिक्रिया दल, और ग्रामीणों को नियमित जागरूकता अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। वरना कापू रेंज जैसे इलाकों में यह संघर्ष किसी दिन एक और बड़ी त्रासदी का रूप ले सकता है।
समाचार सहयोगी सिकंदर चौहान