बिजली सरप्लस राज्य में महंगे बिल का प्रस्ताव: 6,000 करोड़ के घाटे की आड़ में आम जनता पर बोझ?
फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम छत्तीसगढ़, जिसे वर्षों से बिजली सरप्लस राज्य होने का तमगा मिलता रहा है, अब अपने ही दावों के उलट खड़ा नजर आ रहा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य की बिजली वितरण कंपनियों ने जिस तरह औसतन 24 प्रतिशत तक बिजली दरें बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है, उसने आम उपभोक्ता से लेकर उद्योग जगत तक को असमंजस में डाल दिया है। यह प्रस्ताव सीधे-सीधे राज्य शासन और बिजली कंपनियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
30 दिसंबर को छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) के समक्ष दायर की गई टैरिफ याचिका में कंपनियों ने करीब 6,000 करोड़ रुपये के राजस्व अंतर का हवाला दिया है। कंपनियों का तर्क है कि बढ़ती उत्पादन लागत, कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पिछले वर्षों के वित्तीय घाटे ने उनकी आर्थिक सेहत बिगाड़ दी है। ऐसे में दरें नहीं बढ़ीं, तो निर्बाध बिजली आपूर्ति खतरे में पड़ सकती है।
घाटा या कुप्रबंधन?
यह पहला मौका नहीं है जब बिजली कंपनियों ने घाटे का हवाला देकर उपभोक्ताओं से जेब ढीली करने की मांग की हो। सवाल यह है कि जब राज्य में बड़े ताप विद्युत संयंत्र, पर्याप्त कोयला संसाधन और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है, तो फिर हर साल घाटे का आंकड़ा क्यों खड़ा किया जाता है? क्या यह वास्तव में बढ़ती लागत का परिणाम है या फिर वर्षों से चले आ रहे कुप्रबंधन और नीतिगत विफलताओं की कीमत उपभोक्ता चुका रहा है?
कंपनियों के अनुसार, इस बार का घाटा केवल चालू वर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पिछले वर्षों का ‘ट्रू-अप’ भी शामिल है। यानी पुराने हिसाब-किताब का बोझ भी अब वर्तमान उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी है।
नियामक आयोग की कसौटी
हालांकि राहत की बात यह है कि बिजली कंपनियों की मांग को अंतिम सच मान लेना जल्दबाजी होगी। नियामक आयोग की भूमिका यहीं निर्णायक हो जाती है। आयोग कंपनी के हर दावे की बारीकी से जांच करता है—खर्च कहां हुआ, कितना जरूरी था और कहां फिजूलखर्ची हुई। इसके बाद जनसुनवाई के जरिए आम नागरिकों, व्यापारिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा।
पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि कंपनियों के दावों और आयोग के फैसलों में अक्सर जमीन-आसमान का फर्क रहा है।
पिछला रिकॉर्ड देता है उम्मीद
पिछले साल भी बिजली कंपनी ने लगभग 5,000 करोड़ रुपये के घाटे का हवाला देकर बड़ी दर वृद्धि का प्रस्ताव रखा था। लेकिन आयोग की सख्त जांच में महज 500 करोड़ रुपये का घाटा ही जायज ठहराया गया। नतीजा यह हुआ कि बिजली दरों में केवल 1.89 से 2 प्रतिशत तक की सीमित बढ़ोतरी हुई। यही कारण है कि इस बार भी जानकार मान रहे हैं कि 24 प्रतिशत की मांग कागजों में ही सिमट सकती है।
राज्य शासन की जिम्मेदारी
सबसे अहम सवाल राज्य शासन की भूमिका को लेकर है। बिजली दरों में किसी भी तरह की बड़ी वृद्धि का सीधा असर आम परिवार की रसोई, छोटे व्यापार और उद्योगों की लागत पर पड़ेगा। ऐसे में सरकार के लिए यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चुनौती भी है। एक ओर सरकार सस्ती बिजली और उद्योग प्रोत्साहन की बात करती है, दूसरी ओर उसकी कंपनियां भारी बढ़ोतरी की मांग लेकर खड़ी हैं।
जनता की नजरें जनसुनवाई पर
अब सबकी निगाहें फरवरी-मार्च में होने वाली जनसुनवाई पर टिकी हैं। यहीं तय होगा कि छत्तीसगढ़ की जनता को बिजली के नाम पर राहत मिलेगी या फिर ‘घाटे’ का करंट सीधे उनके बिजली बिल में उतरेगा। सवाल सिर्फ दाम बढ़ने या न बढ़ने का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है—जिसका जवाब आखिरकार राज्य शासन और उसकी एजेंसियों को ही देना होगा।