प्रगति के नाम पर विनाश: जब विकास ने जंगलों से बेदखल कर दिया जीवन
फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम
जिस विकास को आज देश की तरक्की का सबसे बड़ा पैमाना बताया जा रहा है, वही विकास अब कठघरे में खड़ा दिखाई देता है। चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें, उद्योगों की कतारें और कंक्रीट का फैलता साम्राज्य—इन सबके पीछे अगर झाँककर देखें, तो उजड़े जंगल, सूखती नदियाँ और भटकते जंगली जानवर साफ नज़र आते हैं। सवाल सीधा है—क्या यही वह विकास है, जिस पर हमें गर्व करना चाहिए?
आज देश के कई हिस्सों में यह आम दृश्य बनता जा रहा है कि बंदर, हिरण, हाथी और अन्य वन्य जीव रिहायशी इलाकों में भटकते हुए दिखाई देते हैं। कभी घने जंगलों में सुरक्षित जीवन जीने वाले ये जीव अब सड़कों पर आकर इंसानों से भोजन की आस लगाए खड़े हैं। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि इंसान द्वारा रची गई त्रासदी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन, उद्योगों का अनियंत्रित विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलित दोहन इसका मूल कारण है। जब जंगल सिकुड़ते हैं, तो जानवरों का घर छिनता है। जब नदियों पर कब्ज़ा होता है और पानी प्रदूषित किया जाता है, तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र चरमरा जाता है।
पर्यावरणविद साफ चेतावनी देते हैं कि विकास के नाम पर प्रकृति से की गई छेड़छाड़ का असर केवल जानवरों तक सीमित नहीं रहता। प्रदूषित हवा, ज़हरीला पानी और रसायनों से उपजी फसलें सीधे-सीधे इंसान के स्वास्थ्य पर प्रहार कर रही हैं। शहरों में बढ़ती सांस की बीमारियाँ, कैंसर, जल संकट और असामान्य मौसम—ये सब उसी तथाकथित विकास की देन हैं।
दरअसल, जंगली जानवर केवल जंगल की शोभा नहीं होते, वे पूरे पर्यावरण की रीढ़ हैं। खाद्य श्रृंखला का संतुलन इन्हीं पर टिका है। एक प्रजाति के खत्म होते ही पूरा तंत्र डगमगा जाता है। कई जानवर बीज फैलाने, जंगल को पुनर्जीवित करने और कीटों की संख्या नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। स्वस्थ जंगल और जैव विविधता ही जलवायु संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है।
फिर सवाल उठता है कि इंसान इन्हें भूल क्यों जाता है?
क्योंकि विकास की परिभाषा को हमने बेहद संकीर्ण बना लिया है। सड़क, भवन, फैक्ट्री और मुनाफा—बस यही हमें विकास दिखता है। तत्काल लाभ की सोच हमें भविष्य के खतरों से आँख मूंदने पर मजबूर कर देती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान खुद को प्रकृति से अलग समझने लगा है, जबकि वह उसी का हिस्सा है।
असल में सच्चा विकास वही है जिसमें इंसान आगे बढ़े, लेकिन प्रकृति पीछे न छूटे। जिसमें जंगल सुरक्षित रहें, नदियाँ बहती रहें और जंगली जानवर अपने प्राकृतिक आवास में सम्मान के साथ जीवन जी सकें।
यदि आज हमने संतुलित और टिकाऊ विकास की राह नहीं चुनी, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। जल संकट, महामारी और जलवायु आपदाएँ हमें पहले ही चेतावनी दे रही हैं। जंगली जानवर कोई बाधा नहीं, बल्कि प्रकृति के मौन प्रहरी हैं। उन्हें बचाना दरअसल अपने भविष्य को बचाना है।
वरना कल हमारी संताने हमसे यही सवाल करेंगी—यह कैसा विकास था, जिसने जीवन की जड़ों को ही काट दिया?
— मनोज मेहर