कलम पर वार की साजिश: सूरजपुर में तहसीलदार–भूमाफिया गठजोड़ बेनकाब, पत्रकार की हत्या की सुपारी मामले में FIR से हड़कंप

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम सूरजपुर
सूरजपुर जिले में सामने आया यह मामला किसी एक पत्रकार पर हमला भर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद—स्वतंत्र पत्रकारिता—को कुचलने की सुनियोजित कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले पत्रकार की हत्या की सुपारी देने के आरोपों में लटोरी तहसीलदार सुरेंद्र साय पैंकरा, भूमाफिया संजय गुप्ता–हरिओम गुप्ता, तथाकथित पत्रकार फिरोज अंसारी और उसके साले असलम सहित कई लोगों पर प्रतापपुर थाना में अपराध दर्ज किया गया है। FIR दर्ज होते ही प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है।

मामले की जड़ में वे खबरें हैं, जिनमें हिंद स्वराष्ट्र और सिंधु स्वाभिमान के संपादकों ने तहसीलदार सुरेंद्र पैंकरा पर जमीन से जुड़े गंभीर फर्जीवाड़े उजागर किए थे। आरोप है कि कलेक्टर की अनुमति और पटवारी प्रतिवेदन के बिना नियमों को दरकिनार कर अवैध रजिस्ट्रियां और नामांतरण कराए गए। खबरों के बाद SDM सूरजपुर ने तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन चार महीने बाद भी जांच रिपोर्ट का सामने न आना इस पूरे प्रकरण को और संदेहास्पद बनाता है।

जांच में सामने आया है कि इस कथित फर्जीवाड़े का सीधा लाभ लटोरी तहसील के ग्राम हरिपुर निवासी संजय गुप्ता और उसके पुत्र हरिओम गुप्ता को मिला। वर्षों से जमीन दलाली में सक्रिय बताए जा रहे इन लोगों पर तहसीलदार से मिलीभगत कर नामांतरण कराने के आरोप हैं। जब पत्रकारों ने इस नेटवर्क पर सवाल उठाए, तो पहले धमकियों का दौर चला और फिर कथित तौर पर हत्या की साजिश रची गई। पत्रकारों को चेताया गया कि “तहसीलदार से दूर रहो, नहीं तो अंजाम भुगतना पड़ेगा।”

पुलिस जांच के मुताबिक पत्रकार प्रशांत पाण्डेय की हत्या के लिए डेढ़ लाख रुपये में सुपारी तय की गई थी और इसे अंजाम देने के लिए तीन बार प्रयास किए गए। एक बार ट्रक से कुचलने की योजना बनी, दूसरी बार शूटर बुलाया गया और तीसरी बार कार से टक्कर मारने की कोशिश की गई। संयोग और सतर्कता के चलते हर बार पत्रकार की जान बच गई। बाद में हरिपुर ग्रामसभा के दौरान आरोपियों के बीच आपसी विवाद में पूरी साजिश सार्वजनिक हो गई, जहां भरी पंचायत में धमकी और सुपारी देने की बात स्वीकार किए जाने का दावा किया जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतने गंभीर आरोप, दस्तावेजी सबूत और अब FIR तक दर्ज हो चुकी है, तो SDM स्तर की जांच चार महीने से क्यों लटकी हुई है। क्या यह प्रशासनिक उदासीनता है या फिर प्रभावशाली आरोपियों को दिया जा रहा संरक्षण? फिलहाल पुलिस ने जांच तेज करने और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है, लेकिन इस प्रकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सत्ता, पैसा और माफिया जब एकजुट होते हैं, तो सबसे पहले निशाने पर सच बोलने वाली कलम ही आती है—और अंततः इंसाफ की उम्मीद अदालत से ही रह जाती है।