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ज़रूरत नहीं, फिर भी अधिग्रहण का दबाव? अडानी की रेल लाइन प्रकरण में उठे गंभीर सवाल, प्रक्रिया पर संदेह गहराया

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
जिले में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में एक बार फिर ऐसा प्रकरण सामने आया है, जिसने प्रशासनिक प्रक्रिया और मंशा—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला रायगढ़ तहसील के मुरालीपाली गांव का है, जहां अडाणी पावर की प्रस्तावित रेल लाइन के नाम पर एक भूमि स्वामी की जमीन को लेकर असामान्य स्थिति बनी हुई है। हैरानी की बात यह है कि कंपनी को यह जमीन अब आवश्यकता नहीं है, इसके बावजूद अधिग्रहण से जुड़ी फाइलें आगे बढ़ाई जा रही हैं।

मुरालीपाली निवासी मनोज साहू पिता अक्षय साहू की भूमि खसरा नंबर 258/8, रकबा 0.060 हेक्टेयर का डायवर्सन पूर्व में ही हो चुका है। बताया जाता है कि बड़े भंडार रेलवे लाइन परियोजना के तहत धारा 4 के प्रकाशन के समय इस खसरा नंबर को अधिग्रहण सूची में शामिल किया गया था। बाद में जब धारा 11 के तहत अंतिम प्रक्रिया हुई, तब कंपनी की आवश्यकता समाप्त होने के चलते इस खसरा नंबर को सूची से हटा दिया गया।

इसके बावजूद भूमि स्वामी मनोज साहू ने इस निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने उनके आवेदन को स्वीकार करते हुए 30 दिनों के भीतर विधिवत कार्रवाई करने के निर्देश दिए। यहीं से पूरा मामला उलझता चला गया, क्योंकि रेल लाइन के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है और कंपनी आवश्यकतानुसार जमीन प्राप्त कर चुकी है।

अब जिस खसरा नंबर को हटाया जा चुका था, उसे दोबारा लेने के लिए “आपसी सहमति से क्रय नीति” के तहत प्रकरण चलाया जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी को जमीन की जरूरत ही नहीं है, तो फिर यह प्रक्रिया किसके दबाव में और किस उद्देश्य से आगे बढ़ रही है। आमतौर पर उद्योगों के लिए भूमि क्रय या अधिग्रहण का प्रस्ताव उद्योग विभाग के माध्यम से आता है, लेकिन इस मामले में सीधे तहसीलदार स्तर से फाइल आगे बढ़ाई जा रही है। हैरानी यह भी है कि इस पूरे प्रकरण में एसडीएम, जो भू-अर्जन के सक्षम अधिकारी होते हैं, उनकी कोई भूमिका सामने नहीं आ रही।

नई गाइडलाइन और भुगतान का पेंच

आपसी सहमति से क्रय नीति के तहत यदि भूमि का क्रय होता है तो नई गाइडलाइन दरों के अनुसार रजिस्ट्री की जाएगी। लेकिन यहां भी कई व्यावहारिक अड़चनें हैं। सूत्रों की मानें तो कंपनी इस जमीन को खरीदने के पक्ष में नहीं है, फिर भी उस पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि जब कंपनी भुगतान ही नहीं करना चाहती, तो अधिग्रहण या क्रय की प्रक्रिया आखिर कैसे पूरी होगी।

पूरा मामला अब केवल एक जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, कानूनी प्रक्रिया और उद्योग-प्रशासन-भूमि स्वामी के बीच तालमेल पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि जिला प्रशासन इस संदेहास्पद प्रकरण पर क्या रुख अपनाता है और क्या वाकई बिना आवश्यकता के किसी भूमि का अधिग्रहण किया जा सकता है।

Amar Chouhan

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