उद्योग नगरी में पानी पर बकाया अरबों का खेल: रायगढ़ में 47 उद्योगों के जल-कर का कच्चा चिट्ठा उजागर, कई दिग्गजों पर करोड़ों बकाया

रायगढ़। छत्तीसगढ़ की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले रायगढ़ जिले में उद्योगों द्वारा जल संसाधन विभाग को दिया जाने वाला जल कर (Water Tax) एक बार फिर चर्चा में है। जल संसाधन संभाग रायगढ़ का माह अक्टूबर 2025 तक का वसूली विवरण सामने आया है, जिसने कई बड़े उद्योग घरानों की पोल खोल दी है।
यह दस्तावेज F:WRD NEW ACCOUNT SECTION/RAJASWA WASULI की फाइल से है, जिसमें (अ) 0702 जल कर से वसूली के तहत 47 औद्योगिक संस्थानों का पूरा हिसाब-किताब दर्ज है।
आंकड़ों में क्या है?
विभाग के अनुसार 1 अप्रैल 2025 की स्थिति में ही उद्योगों पर पिछले साल का हजारों लाख रुपये का बकाया था। इसके बाद 2025-26 के लिए नई मांग जोड़ी गई।
दस्तावेज के मुताबिक –
1. सबसे बड़े बकायादार:
– *जिंदल स्टील पावर लिमिटेड, तमनार – इस पर अकेले 54 MCM पानी के आवंटन के एवज में 1701 लाख रुपये की मांग है, जिसमें से 992.25 लाख ही अब तक जमा हुआ है।
– मोनेट इस्पात लिमिटेड, गढ़उमरीया – 8.3 MCM आवंटन पर 784.350 लाख का बकाया, जिसमें से 303.868 लाख की वसूली हुई है।
– जिंदल स्टील एंड पावर लि. (डी.सी.पी.पी) डोंगामहुआ – 5.4 MCM पर 567 लाख की मांग।
– नलवा स्टील लिमिटेड, ताराईमाल – 3.46 MCM पर 155.700 लाख।
और अन्य कई उद्योग
2. कुल योग का गणित:
दस्तावेज के दूसरे पन्ने पर दर्ज योग के अनुसार, कुल वार्षिक आवंटित जल की मात्रा 191.501 मिलियन घन मीटर है। 01.04.2025 को कुल अवशेष राशि 805.540 लाख थी, और चालू वर्ष 2025-26 की कुल मांग 10153.213 लाख तक पहुंच गई। यानी कुल लक्ष्य 10958.753 लाख* रुपये से अधिक का था।
अक्टूबर माह तक विभाग ने पिछले माह तक 3048.786 लाख और इस माह 275.456 लाख मिलाकर कुल 3324.242 लाख की वसूली की है, लेकिन अभी भी 3856.441 लाख से ज्यादा वसूली शेष है। कई उद्योगों में तो ब्याज समेत राशि लगातार बढ़ रही है।
3. कई उद्योगों ने नहीं चुकाया एक रुपया:
सूची में सिविल इंटरप्राइजेज तराईमाल, एम/एस पी स्टील एंड पावर लिमिटेड जामगांव जैसे कई नाम हैं जिनके कॉलम में जमा राशि शून्य (0.000) दिख रही है। मतलब पूरे साल का जल कर अभी तक जमा ही नहीं हुआ।
4. भू-जल पर भी निर्भरता:
ज्यादातर बड़े उद्योग केलो नदी, महानदी और भू-जल (भू-जल) दोनों से पानी ले रहे हैं। कई छोटे स्पंज आयरन प्लांट पूरी तरह भू-जल पर निर्भर हैं, जिनका हिसाब भी इसी में जोड़ा गया है।
यह सिर्फ एक वसूली पत्रक नहीं, बल्कि सिस्टम की कहानी है। एक तरफ गांव-गांव में पेयजल के लिए हैंडपंप सूख रहे हैं, दूसरी तरफ हजारों मिलियन घन मीटर पानी उद्योगों को आवंटित है और उसका पैसा समय पर सरकारी खजाने में नहीं पहुंच रहा।
सवाल यह है कि जब एक आम किसान का बिजली बिल कुछ महीने बकाया हो तो कनेक्शन कट जाता है, तो करोड़ों का जल कर बकाया रखने वाले इन उद्योगों पर विभाग कितनी सख्ती दिखा पाता है?
बहरहाल, यह दस्तावेज अक्टूबर 2025 तक का है और अब नवंबर-दिसंबर में विभाग वसूली के लिए नोटिस और ब्याज की प्रक्रिया तेज करेगा। देखने वाली बात होगी कि इस सूची के बाद कितने उद्योग अपना बकाया चुकाते हैं और कितनों पर जलापूर्ति रोकने जैसी कार्रवाई होती है।
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