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रायगढ़ में कानून बेबस, सड़कें बनीं अदालत: चक्रधर नगर की घटना ने खोली ‘रोड जस्टिस’ और थाने की सियासत

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
यह अब इक्का-दुक्का घटना नहीं रही। रायगढ़ में कानून की किताबें बंद होती दिख रही हैं और सड़कें खुली अदालत बनती जा रही हैं। भीड़ फैसला सुनाती है, लाठियां सजा देती हैं और अंत में थाने का दरवाज़ा पीड़ित के लिए नहीं, बल्कि उसी के खिलाफ खुलता है। चक्रधर नगर चौक के पास सरला विला इलाके में हुई ताजा घटना ने इस खतरनाक प्रवृत्ति पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीती रात 7–8 लोगों ने बीच सड़क एक अनुसूचित जाति के युवक की जमकर पिटाई की। वीडियो वायरल हुआ, गालियां रिकॉर्ड हुईं, भीड़ की हिंसा साफ दिखी—लेकिन कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि जब घायल युवक न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंचा, तो लॉकअप उसी के लिए खुल गया।

चार महीने पहले की चेतावनी, जिसे पुलिस ने अनसुना किया

पीड़ित के मुताबिक, अगस्त में ही उसने शिकायत दी थी कि उसी इलाके के कुछ लोग उसे रोककर जातिगत गालियां दे रहे हैं और धमका रहे हैं। शिकायत अजाक थाने तक पहुंची, आवेदन लगा—लेकिन कार्रवाई शून्य रही। न नसीहत, न एफआईआर, न सुरक्षा। नतीजा यह हुआ कि शिकायत दब गई और हिंसा बढ़ गई।

बीच सड़क पिटाई, फिर थाने में पलटा खेल

कल शाम वही लोग—एक स्थानीय महिला और रामू सिंधी सहित—भीड़ के साथ पहुंचे और युवक की सार्वजनिक रूप से पिटाई की। किसी तरह जान बचाकर वह चक्रधर नगर थाने पहुंचा। उम्मीद थी कि अब कानून बोलेगा। लेकिन आरोप है कि वहां उल्टा उसे बैठा लिया गया और आरोपी पक्ष को यह “कानूनी सलाह” दी गई कि नाबालिग बच्ची के नाम से शिकायत दर्ज कराकर मामला पॉक्सो जैसे गंभीर कानून में उलझाया जाए।

अगर यह सच है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं, बल्कि पूरी न्याय प्रक्रिया का अपहरण है।

कर्तव्य याद दिलाने पर जागी पुलिस

स्थिति तब बदली जब एक बड़े नेता ने कार्यकारी थाना प्रभारी को उनका कर्तव्य याद दिलाया। तब जाकर मार खाने वाले की शिकायत सुनी गई, मेडिकल कराया गया। लेकिन दूसरी तरफ, पीड़ित को गंभीर मामलों में फंसाने की तैयारी की चर्चा भी चलती रही। सवाल यह है कि कानून अपने आप क्यों नहीं चला?

रायगढ़ का नया ‘जस्टिस मॉडल’?

इस पूरी घटना से एक खतरनाक संदेश जाता है—

सड़क पर पीट दो,

थाने में दबाव बनाओ,

और पीड़ित को ही आरोपी बना दो।


अगर आपके पास पैसा, रसूख या भीड़ है, तो सच आपकी जेब में है। वरना न्याय एक एहसान बनकर रह जाता है।

सवाल जो प्रशासन से जवाब मांगते हैं

क्या जातिगत हिंसा की शिकायतों को गंभीरता से लेना पुलिस की प्राथमिकता नहीं?

क्या पॉक्सो जैसे कानून अब डराने और दबाने का औज़ार बनते जा रहे हैं?

और क्या रायगढ़ में कानून का राज सड़क और थाने के बीच कहीं गुम हो चुका है?


चक्रधर नगर की घटना कोई अपवाद नहीं, बल्कि चेतावनी है। अगर प्रशासन ने समय रहते इस ‘रोड साइड जस्टिस’ पर लगाम नहीं लगाई, तो कल किसी और चौक पर कोई और पीड़ित होगा—और वीडियो फिर वायरल होगा।
न्याय तब नहीं बचता, जब वह ताकतवर की सुविधा बन जाए।

Amar Chouhan

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