“सरकारी सेवा या संगठन की सियासत—दो नावों पर सवारी अब नहीं: कर्मचारियों की ‘नेतागीरी’ पर सख्त रोक”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायपुर। लंबे समय से सरकारी दफ्तरों के गलियारों में एक अनकही व्यवस्था चलती रही—कर्मचारी दिन में सरकारी फाइलों के बीच और शाम को किसी न किसी संगठन, समिति या मंच की अगुवाई करते नजर आते थे। अब इस दोहरी भूमिका पर सरकार ने साफ लकीर खींच दी है। ताजा निर्देशों में शासकीय कर्मचारियों को किसी भी शासकीय या अशासकीय संस्था, समिति या संगठन में पदाधिकारी बनने से रोक दिया गया है।
यह आदेश केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति में बदलाव का संकेत माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि जब कोई कर्मचारी किसी संगठन में पदाधिकारी की भूमिका निभाता है, तो उसकी प्राथमिकताएं बंट जाती हैं। नतीजा—दफ्तर की जिम्मेदारियां पीछे छूट जाती हैं और बाहरी गतिविधियां आगे निकल जाती हैं।
सूत्र बताते हैं कि कई मामलों में यह देखा गया कि कर्मचारी संगठनात्मक पद का इस्तेमाल प्रभाव और दबाव बनाने के लिए भी करने लगे थे। स्थानांतरण से लेकर विभागीय निर्णयों तक, “पदाधिकारी” होने का असर दिखने लगा था। यही वजह है कि अब सरकार ने स्पष्ट कर दिया है—सरकारी सेवा में रहते हुए किसी भी तरह की नेतागीरी स्वीकार्य नहीं होगी।
आदेश की खास बात यह है कि इसमें केवल बड़े संगठनों ही नहीं, बल्कि छोटी-छोटी समितियों और स्थानीय स्तर के मंचों को भी शामिल किया गया है। यानी अब कर्मचारी चाहे किसी सांस्कृतिक समिति, सहकारी संस्था या सामाजिक संगठन में ही क्यों न हों, पदाधिकारी बनने से पहले उन्हें नियमों का ध्यान रखना होगा।
प्रशासनिक हलकों में इसे “हितों के टकराव” (Conflict of Interest) को रोकने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि जब एक व्यक्ति दो अलग-अलग भूमिकाओं में होता है, तो निष्पक्षता प्रभावित होती है। ऐसे में यह कदम पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
हालांकि, कर्मचारी संगठनों में इस फैसले को लेकर हलचल भी है। कुछ लोगों का कहना है कि इससे कर्मचारियों की सामूहिक आवाज कमजोर पड़ सकती है। वहीं, सरकार का रुख साफ है—व्यक्तिगत अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन सरकारी सेवा की मर्यादा और जिम्मेदारी सर्वोपरि है।
अब संदेश साफ है—सरकारी नौकरी में रहते हुए प्राथमिकता केवल सरकारी काम होगी। मंच, संगठन और पद की राजनीति से दूरी बनाकर ही कर्मचारी अपनी सेवा निभा पाएंगे। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का असर दफ्तरों की कार्यशैली और कर्मचारी संगठनों की गतिविधियों पर किस तरह पड़ता है।
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