EXCLUSIVE | दलितों के लिए “विकास भवन” पर ताले, एक माह से न्याय पर ताला — सरिया थाना क्यों मौन?

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम
सारंगढ़-बिलाईगढ़।
संविधान ने जिन नागरिकों को समानता, सम्मान और सार्वजनिक सुविधाओं तक समान अधिकार दिया है, वही अधिकार सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के सरिया थाना क्षेत्र में खुलेआम ताले में कैद कर दिए गए हैं। ग्राम छोटे मानिकपुर में विकास प्राधिकरण द्वारा निर्मित सामुदायिक भवन पर कथित रूप से इसलिए ताले जड़े गए, ताकि अनुसूचित जाति समाज के लोग उसमें प्रवेश न कर सकें।
यह कोई सामान्य विवाद नहीं, बल्कि छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार का वह मामला है, जिसे कानून संज्ञेय अपराध मानता है। इसके बावजूद पीड़ितों की शिकायत को एक माह तक थाना स्तर पर दबाकर रखा जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
मंदिर, तालाब, भवन — हर सार्वजनिक स्थान पर रोक
अनुसूचित जाति वर्ग चौहान समाज के लोगों द्वारा सरिया थाना में दिए गए लिखित आवेदन में आरोप लगाया गया है कि
सामुदायिक भवन में दलितों का प्रवेश वर्जित किया गया,
तालाब की पचरी में नहाने से रोका गया,
मंदिर में प्रवेश करने पर भी आपत्ति ली गई।
यह सीधे-सीधे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 तथा SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का उल्लंघन है।
एट्रोसिटी कानून के बावजूद FIR नहीं — किसके संरक्षण में अपराध?
कानून स्पष्ट कहता है कि ऐसे मामलों में पुलिस को बिना जांच के भी तत्काल FIR दर्ज करनी होती है। फिर सवाल उठता है कि
➡️ एक माह बाद भी FIR क्यों दर्ज नहीं हुई?
➡️ क्या आरोपी किसी राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण में हैं?
➡️ क्या सरिया थाना को एट्रोसिटी एक्ट की जानकारी नहीं है?
यदि पुलिस स्वयं कानून का पालन नहीं करेगी, तो पीड़ित न्याय के लिए कहाँ जाएँ?
न्याय में देरी, अत्याचार को खुला आमंत्रण
स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्रवाई न होने से दोषियों के हौसले बुलंद हैं। यह चुप्पी न सिर्फ पीड़ितों के अधिकारों का हनन है, बल्कि भविष्य में बड़े सामाजिक टकराव की नींव भी रख रही है।
हिराधर सेठ, दामोदर नंद, किशोर नंद, विनोद कुमार सोना, गौतम, भगवतीया सिदार, समीर, नारायण, दुर्बल सिंह, राधेश्याम, बरतराम सहित अनुसूचित जाति एवं जनजाति समाज के लोगों में गहरा रोष व्याप्त है।
हिंदू एकता के मंच और ज़मीनी हकीकत में टकराव
देशभर में सामाजिक समरसता और हिंदू एकता के संदेश दिए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि एक ही समाज के लोग दूसरे हिंदुओं को मंदिर और सार्वजनिक स्थानों से बाहर कर रहे हैं। सवाल यह नहीं कि सम्मेलन क्यों होते हैं, सवाल यह है कि कानून का डर खत्म क्यों हो गया है?
प्रशासन की चुप्पी भी कठघरे में
अब यह मामला केवल सामाजिक भेदभाव का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है।
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह माना जाएगा कि
कानून को जानबूझकर निष्प्रभावी किया जा रहा है,
पीड़ितों को न्याय से वंचित किया जा रहा है।
सीधी मांग
पीड़ित समाज ने मांग की है कि —
✔️ तत्काल FIR दर्ज हो
✔️ SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएँ लगें
✔️ सामुदायिक भवन के ताले तुरंत खुलवाए जाएँ
✔️ दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो
अन्यथा समाज द्वारा एसपी कार्यालय, कलेक्टर, राज्य अनुसूचित जाति आयोग और मानवाधिकार आयोग तक जाने की तैयारी की जा रही है।