सरकारी कर्ज की वसूली में रायगढ़ का अंत्यावसायी विभाग बेबस, 204 हितग्राहियों पर 3 करोड़ से अधिक बकाया

वाहन खरीदने से लेकर कारोबार शुरू करने तक के लिए दी गई थी आर्थिक मदद, वर्षों बाद भी पूरी नहीं हुई वसूली; अनुसूचित जनजाति वर्ग पर सबसे अधिक 1.59 करोड़ रुपये बकाया
रायगढ़। जरूरतमंदों को स्वरोजगार से जोड़ने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से संचालित सरकारी ऋण योजनाओं की राशि यदि समय पर वापस नहीं आती, तो इसका असर उन लोगों पर भी पड़ता है जिन्हें भविष्य में इसी सहायता की जरूरत हो सकती है। रायगढ़ जिले में अंत्यावसायी विभाग के समक्ष लंबित ऋणों की वसूली का मामला इसी सवाल को सामने ला रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जिले में 204 ऋण हितग्राहियों से कुल 3 करोड़ 46 हजार 805 रुपये की वसूली शेष है।
विभाग की योजनाओं के तहत किसी हितग्राही को वाहन खरीदने, किसी को लघु व्यवसाय शुरू करने, तो किसी को अन्य स्वरोजगार गतिविधियों के लिए ऋण उपलब्ध कराया गया था। इन योजनाओं का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देना था। लेकिन ऋण की अदायगी लंबित रहने से सरकारी सहायता की राशि लंबे समय से वसूली की प्रतीक्षा में है।
इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि सरकारी ऋण योजनाओं की सफलता केवल पात्र लोगों को राशि वितरित करने से नहीं मापी जा सकती। ऋण का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए हो, हितग्राही समय पर किश्तें चुकाएं और वसूल हुई राशि का लाभ दूसरे जरूरतमंदों तक पहुंचे, तभी ऐसी योजनाओं का चक्र प्रभावी ढंग से चल सकता है।
किसी ने खरीदा ट्रैक्टर, किसी ने शुरू किया कारोबार
अंत्यावसायी विभाग की ऋण योजनाओं के तहत अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से हितग्राहियों को आर्थिक सहायता दी गई थी। किसी ने व्यावसायिक उपयोग के लिए ट्रैक्टर-ट्रॉली खरीदने के उद्देश्य से ऋण लिया, तो किसी ने छोटा व्यवसाय खड़ा करने के लिए सरकारी मदद का सहारा लिया।
प्रकाशित विवरण में पुसौर क्षेत्र के सुलोनी निवासी विष्णुचरण का उदाहरण दिया गया है। उन्होंने वर्ष 2009 में ट्रैक्टर-ट्रॉली खरीदने के लिए पांच लाख रुपये का ऋण लिया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके मामले में कुल 5.90 लाख रुपये की अदायगी शेष बताई गई है और विभाग की ओर से नोटिस भेजे जाने का उल्लेख है।
इसी तरह तमनार क्षेत्र के निवासी सनपति ने वर्ष 2016 में लघु व्यवसाय के लिए दो लाख रुपये का ऋण लिया था। उनके मामले में 2.65 लाख रुपये की राशि चुकाया जाना शेष बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग को उनका पता नहीं मिल पा रहा है।
ये उदाहरण लंबित ऋणों की समस्या को सामने रखते हैं। हालांकि, किसी हितग्राही का पता नहीं चलने या ऋण बकाया होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने जानबूझकर सरकारी राशि नहीं चुकाई। प्रत्येक प्रकरण में ऋण अभिलेख, भुगतान का विवरण और वसूली के लिए की गई कार्रवाई की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।
अनुसूचित जनजाति वर्ग पर सबसे अधिक बकाया
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ऋण की वसूली के लिए लंबित राशि में अनुसूचित जनजाति वर्ग का हिस्सा सबसे अधिक है। इसके बाद अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हितग्राहियों का स्थान है।
हितग्राही वर्ग| बकाया हितग्राही| शेष राशि
अनुसूचित जाति (अजा)| 47| ₹69,18,753
अनुसूचित जनजाति (अजजा)| 60| ₹1,59,07,885
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)| 45| ₹34,46,551
अल्पसंख्यक| 22| ₹7,31,492
सामान्य वर्ग| 30| ₹30,42,124
कुल| 204| ₹3,00,46,805
आंकड़ों के मुताबिक, अनुसूचित जनजाति वर्ग के 60 हितग्राहियों पर एक करोड़ 59 लाख सात हजार 885 रुपये बकाया हैं। यह कुल लंबित राशि का आधे से अधिक हिस्सा है। अनुसूचित जाति वर्ग के 47 हितग्राहियों से 69 लाख 18 हजार 753 रुपये की वसूली शेष है।
ओबीसी वर्ग के 45 हितग्राहियों पर 34 लाख 46 हजार 551 रुपये, सामान्य वर्ग के 30 हितग्राहियों पर 30 लाख 42 हजार 124 रुपये और अल्पसंख्यक वर्ग के 22 हितग्राहियों पर सात लाख 31 हजार 492 रुपये बकाया बताए गए हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि ऋण वसूली की चुनौती अलग-अलग वर्गों में मौजूद है। हालांकि, केवल वर्गवार आंकड़ों के आधार पर किसी समुदाय के हितग्राहियों की मंशा या भुगतान व्यवहार के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
कम ब्याज और सब्सिडी के बावजूद क्यों अटकी वसूली?
सरकारी ऋण योजनाओं का उद्देश्य बाजार दरों पर आसानी से ऋण नहीं प्राप्त कर पाने वाले लोगों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होता है। योजनाओं में पात्रता के अनुसार कम ब्याज दर या अनुदान जैसी सुविधाएं भी दी जा सकती हैं। इसके बावजूद ऋण की वसूली लंबे समय तक लंबित रहना विभागीय निगरानी और ऋण प्रबंधन पर सवाल खड़े करता है।
यह जानना जरूरी है कि 204 प्रकरणों में कितने हितग्राही नियमित किश्तें चुकाने में असमर्थ हैं, कितने के पते बदल चुके हैं, कितने मामलों में नोटिस जारी हुए हैं और कितने प्रकरणों में नियमानुसार वसूली की कार्रवाई की गई है। इसी तरह यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बकाया राशि में मूलधन और ब्याज का कितना हिस्सा शामिल है तथा कितने हितग्राहियों ने अब तक आंशिक भुगतान किया है।
इन जानकारियों के बिना पूरे बकाये को केवल जानबूझकर भुगतान नहीं करने का मामला मान लेना उचित नहीं होगा। प्रभावी वसूली के लिए प्रत्येक प्रकरण की वास्तविक स्थिति का परीक्षण आवश्यक है।
सरकारी योजनाओं की निरंतरता के लिए वसूली जरूरी
अंत्यावसायी विभाग की योजनाएं जरूरतमंदों को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने से जुड़ी हैं। ऐसे में ऋण राशि की समय पर वसूली केवल सरकारी बकाया कम करने का विषय नहीं, बल्कि योजनाओं की निरंतरता से भी जुड़ी है।
यदि ऋण की राशि लंबे समय तक वापस नहीं आती, तो उपलब्ध वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। वहीं, समयबद्ध वसूली और पारदर्शी ऋण प्रबंधन से भविष्य में दूसरे पात्र हितग्राहियों को सहायता उपलब्ध कराने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
विभाग के सामने चुनौती यह है कि वास्तविक रूप से भुगतान करने में सक्षम हितग्राहियों से नियमानुसार वसूली की जाए और आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे लोगों के मामलों में लागू नियमों के अनुरूप समाधान तलाशा जाए।
अब विभाग की कार्रवाई पर टिकी नजर
रायगढ़ जिले में 204 हितग्राहियों से तीन करोड़ रुपये से अधिक की लंबित राशि की वसूली का मामला सरकारी ऋण योजनाओं की निगरानी को महत्वपूर्ण बनाता है। अब यह देखना होगा कि विभाग बकायादारों का सत्यापन, नोटिस की तामिली और नियमानुसार वसूली की प्रक्रिया को किस तरह आगे बढ़ाता है।
साथ ही, विभागीय स्तर पर यह जानकारी सार्वजनिक होना भी जरूरी है कि कितनी राशि अब तक वसूल की जा चुकी है, कितने प्रकरणों का निराकरण हुआ है और शेष मामलों में आगे की क्या कार्ययोजना है। इससे न केवल जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी, बल्कि जरूरतमंदों के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं के प्रति लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।
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