कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन एवं विकास) अधिनियम, 1957 को लेकर देशभर में नए सिरे से बहस की मांग तेज — क्या समय आ गया है कानून की समीक्षा का?

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
नई दिल्ली/रायपुर।
देश के कोयला-समृद्ध राज्यों में भूमि अधिग्रहण और खनन परियोजनाओं को लेकर एक बार फिर 1957 में लागू हुए कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन एवं विकास) अधिनियम (Coal Bearing Areas Acquisition and Development Act, 1957) पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। प्रभावित क्षेत्रों के सामाजिक संगठनों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कानून का वर्तमान स्वरूप अब बदलते सामाजिक, आर्थिक और संवैधानिक परिदृश्य के अनुरूप नहीं रह गया है।
1957 का कानून: जिन परिस्थितियों में बना था आधार
स्वतंत्रता के बाद भारत आर्थिक पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा था। उस समय ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयला उद्योग को संगठित और नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस की गई। इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1957 में कोयला धारक क्षेत्रों के अधिग्रहण और विकास के लिए यह विशेष अधिनियम लाया गया।
उस दौर में देश में निजी और असंगठित खनन व्यवस्था के कारण उत्पादन, सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों को लेकर गंभीर समस्याएँ थीं। खदानों में न तो मानकीकृत सुरक्षा व्यवस्था थी और न ही श्रमिकों के हितों की कोई मजबूत कानूनी संरचना। इन्हीं परिस्थितियों के समाधान के लिए बाद में 1973 में कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण भी किया गया।

आज की स्थिति: जमीनी हकीकत पर उठते सवाल
वर्तमान में भूमि अधिग्रहण और खनन विस्तार के मामलों में इस अधिनियम के प्रयोग को लेकर कई ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में असंतोष देखा जा रहा है। प्रभावित समुदायों का आरोप है कि—
अधिग्रहण की प्रक्रिया में स्थानीय सहमति और पुनर्वास के मुद्दे कमजोर पड़ते हैं
भूमि स्वामित्व और पारंपरिक अधिकारों पर प्रभाव पड़ता है
कई स्थानों पर अन्य संवैधानिक प्रावधानों और स्थानीय कानूनों के साथ टकराव की स्थिति बनती है
विकास परियोजनाओं का लाभ स्थानीय समुदायों तक समान रूप से नहीं पहुँचता
विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा कानून, वन अधिकार अधिनियम 2006 और अन्य स्थानीय सुरक्षा कानूनों के प्रभाव को लेकर भी प्रश्न उठाए जाते हैं।
आउटसोर्सिंग और रोजगार संरचना पर बहस
खनन उद्योग में बढ़ती आउटसोर्सिंग और एमडीओ (Mine Developer and Operator) मॉडल को लेकर भी असंतोष की आवाजें उठ रही हैं। स्थानीय श्रमिक संगठनों का कहना है कि इससे स्थायी रोजगार की जगह ठेका व्यवस्था को बढ़ावा मिला है, जिससे मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा प्रभावित हुई है।

कानूनी और संवैधानिक बहस
कार्यकर्ताओं का दावा है कि वर्तमान परिस्थितियों में यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) और अन्य मौलिक अधिकारों के व्यावहारिक प्रभावों पर प्रश्न खड़े करता है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुद्दा अत्यंत जटिल है और इसमें विकास, ऊर्जा सुरक्षा और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन साधना आवश्यक है।
मांग: व्यापक समीक्षा और पुनर्विचार की आवश्यकता
विभिन्न सामाजिक संगठनों और जनआंदोलनों का कहना है कि अब समय आ गया है कि इस अधिनियम की विस्तृत समीक्षा की जाए। उनका सुझाव है कि—
अधिग्रहण प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सहभागी बनाया जाए
पुनर्वास और रोजगार नीति को मजबूत किया जाए
स्थानीय समुदायों की सहमति को अधिक प्रभावी बनाया जाए
पुराने कानूनों को वर्तमान संवैधानिक और सामाजिक ढांचे के अनुरूप संशोधित किया जाए

कोयला क्षेत्र भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन इसके साथ जुड़े भूमि और सामाजिक मुद्दे भी उतने ही संवेदनशील हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि कानून हटाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उसे आज के समय के अनुरूप और अधिक न्यायसंगत बनाया जा सकता है?
यह बहस अब केवल कानून की नहीं, बल्कि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन की बन चुकी है।
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