नया मुआवजा घोटाला: अवैध निर्माणों पर करोड़ों की बारिश, 40% कमीशन के खेल में उलझा भारतमाला

Journalist Amardeep Chauhan
http://amarkhabar.com
रायगढ़। भारतमाला परियोजना के तहत भूमि अधिग्रहण और मुआवजा वितरण को लेकर धरमजयगढ़ में सामने आ रहे तथ्य एक सुनियोजित घोटाले की ओर इशारा कर रहे हैं। प्रारंभिक जांच और दस्तावेजों के अध्ययन में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यहां मुआवजा वितरण की प्रक्रिया को नियमों के विपरीत मोड़कर अवैध परिसंपत्तियों को भी वैध बताकर भारी भरकम भुगतान किया गया। आरोप है कि इस पूरे खेल में 40 प्रतिशत तक कमीशन की दर तय कर ली गई थी, जिसके चलते सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा।
सूत्रों के अनुसार, मैदानी स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों और राजस्व अधिकारियों के बीच तालमेल बनाकर ऐसा तंत्र खड़ा किया गया, जिसमें अवैध शेड, गोदाम और पोल्ट्री फार्म जैसे निर्माणों का त्वरित सर्वे कर उन्हें मुआवजे के दायरे में शामिल किया गया। इतना ही नहीं, परिसंपत्तियों का मूल्यांकन भी वास्तविकता से अधिक दिखाकर कई मामलों में दोगुना भुगतान किया गया।
एक खसरे में कई परतों का खेल
मामले की एक बानगी ग्राम क्षेत्र के खसरा नंबर 143 से सामने आती है। यहां एक व्यक्ति को गोदाम, एसबेस्टस शीट, सीसी फर्श, दरवाजे और खिड़कियों के नाम पर 9632 वर्गफुट का आकलन करते हुए करीब 28.64 लाख रुपये का मुआवजा तय किया गया। इसी खसरे में 1024 वर्गफुट के पोल्ट्री फार्म के लिए अतिरिक्त राशि निर्धारित की गई। ट्यूबवेल के नाम पर भी अलग-अलग मद में भुगतान जोड़ा गया। कुल मिलाकर 31.83 लाख रुपये का आकलन कर इसे दोगुना करते हुए 63.67 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
लेकिन राजस्व अभिलेखों की पड़ताल करने पर तस्वीर अलग नजर आती है। रिकॉर्ड में संबंधित खसरे का प्रभावित रकबा इससे कहीं कम दर्ज है। निर्माण का क्षेत्रफल और प्रभावित भूमि के आंकड़ों में यह अंतर पूरे प्रकरण पर गंभीर सवाल खड़े करता है—क्या जानबूझकर अधिक रकबे का आकलन कर भुगतान बढ़ाया गया?
बिना बंटवारे के अलग-अलग दावे
एक अन्य मामले में, एक ही भूमि पर बिना विधिवत बंटवारे के तीन अलग-अलग दावेदारों को मुआवजा दिए जाने का मामला सामने आया है। खसरा नंबर 151 में एक ही परिवार के तीन सदस्यों के नाम अलग-अलग प्रकरण बनाकर लाखों रुपये का भुगतान किया गया, जबकि जमीन का मूल स्वामित्व एक ही नाम पर दर्ज बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भूमि का विधिक विभाजन नहीं हुआ है, तो इस तरह अलग-अलग मुआवजा देना नियमों के खिलाफ है। इसके अलावा, जिन निर्माणों के लिए भुगतान किया गया, उनके संचालन के कोई ठोस प्रमाण—जैसे विद्युत कनेक्शन—भी रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं मिलते।
राजस्व रिकॉर्ड में भी गड़बड़ियां
धरमजयगढ़ क्षेत्र में सामने आ रहे ये मामले केवल मुआवजा घोटाले तक सीमित नहीं हैं। आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में भी व्यापक स्तर पर हेरफेर किया गया है—कहीं सरकारी जमीन को निजी स्वामित्व में दर्शाया गया, तो कहीं आदिवासी भूमि का हस्तांतरण नियमों के विपरीत हुआ। भारतमाला परियोजना के तहत इन विसंगतियों को और बढ़ाकर अवैध निर्माणों को वैध दिखाने का प्रयास किया गया।
जांच की आंच और संभावित कार्रवाई
स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों और दस्तावेजों के सामने आने के बाद अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि यदि इस प्रकरण की गहन जांच होती है, तो कई जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी इसकी जद में आ सकते हैं। पूर्व में अन्य जिलों में सामने आए समान मामलों में भी राजस्व अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है, जिससे यहां भी सख्त कदम उठने की संभावना जताई जा रही है।
फिलहाल, यह मामला प्रशासन और शासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। भारतमाला जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना में यदि मुआवजा वितरण ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो इसका सीधा असर आम लोगों के भरोसे पर पड़ता है। अब देखना होगा कि जांच एजेंसियां इस जटिल घोटाले की परतें कब तक और किस हद तक खोल पाती हैं।
अन्य अधिक खबरों के लिए स्क्रॉल डाउन करें 👇⬇️