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रायगढ़ के उद्योग बने ‘मौत के कुएं’: जिंदल पैंथर सीमेंट प्लांट में 40 फीट से गिरकर मजदूर की मौत, प्रशासन मौन

रायगढ़ में औद्योगिक सुरक्षा की गंभीर स्थिति और हाल ही में जिंदल प्लांट में हुए दर्दनाक हादसे को उजागर करती हुई एक विशेष समाचार रिपोर्ट:

रायगढ़ |
11 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में स्थित औद्योगिक प्लांटों में सुरक्षा मानकों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सुरक्षा के दावों और भारी-भरकम सरकारी विभागों की मुस्तैदी के दावों के बीच, जिले के उद्योग अब श्रमिकों के लिए ‘मौत के कुएं’ साबित हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के शुरुआती 6 महीनों में ही 15 से ज्यादा मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक तंत्र अब भी गहरी नींद में सोया हुआ है।

ताजा मामला आज 11 जुलाई को जिंदल पैंथर सीमेंट प्लांट से सामने आया है, जहाँ ऊंचाई पर काम करने के दौरान सुरक्षा उपकरणों के अभाव में एक और युवा मजदूर की दर्दनाक मौत हो गई।

40 फीट की ऊंचाई से गिरा मजदूर, मौके पर मची अफरा-तफरी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल के सिंदूरपुर देवली का निवासी शंकर हजारा (उम्र लगभग 40 वर्ष) पिछले एक साल से ‘बीजीसी इंडिया’ नाम की ठेका कंपनी के तहत कारपेंटर (बढ़ई) के रूप में काम कर रहा था।

रोजाना की तरह आज सुबह भी वह प्लांट में काम पर था। काम के दौरान वह लगभग 40 फीट की ऊंचाई पर प्लाई उतारने के लिए चढ़ा था। इसी बीच अचानक उसका पैर फिसल गया और वह बिना किसी सुरक्षा कवच के सीधे नीचे कंक्रीट पर आ गिरा। हादसे के बाद प्लांट में काम कर रहे साथी मजदूरों में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में गंभीर रूप से घायल शंकर को पास के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने चोटों की गंभीरता को देखते हुए उसे मृत घोषित कर दिया।

कागजी साबित हो रही पुलिसिया और प्रशासनिक जांच

घटना की सूचना मिलते ही कोतरा रोड थाना पुलिस ने मर्ग कायम कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है। हालांकि, स्थानीय लोगों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि यह जांच भी पिछले मामलों की तरह महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।

अतीत का कड़वा सच:
रायगढ़ के उद्योगों में पिछले 20 सालों का रिकॉर्ड उठा कर देखें, तो दर्जनों हादसों के बाद भी आज तक किसी बड़े रसूखदार या प्रबंधन अधिकारी को अदालत से एक दिन की सजा भी नहीं हुई है। मामले सालों-साल कोर्ट में खिंचते हैं, जिससे पीड़ित गरीब परिवार आर्थिक रूप से टूट जाता है और अंत में समझौते के लिए मजबूर हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा ठेकेदार या आरोपी पर कुछ हजार रुपयों का जुर्माना लगाकर केस रफा-दफा कर दिया जाता है।

सुरक्षा उपकरणों का अभाव और जिम्मेदार विभागों की ‘मोटी चमड़ी’

श्रमिक संगठनों का सीधा आरोप है कि सीमेंट और स्टील प्लांटों में ऊंचाई से गिरने, गर्म राख (फ्लाइ ऐश) की चपेट में आने और मलबे में दबने से मौतें होना अब आम बात हो चुकी है। प्रबंधन द्वारा श्रमिकों को सेफ्टी बेल्ट, सेफ्टी नेट और हेलमेट जैसे बुनियादी सुरक्षा उपकरण तक मुहैया नहीं कराए जाते।

हाल ही में हुए कुछ प्रमुख हादसे व्यवस्था की पोल खोलते हैं:

मरीन ड्राइव हादसा: सीमेंट मिक्सर मशीन पलटने से ड्राइवर की मौत का मामला फाइलों में दफन हो गया।

श्री रूपेश क्रेशर हादसा: यहाँ एक महिला मजदूर और उसके गर्भ में पल रहे मासूम बच्चे की दोहरी मौत हो गई, लेकिन प्लांट मालिक और ठेकेदार ने आज तक पीड़ित परिवार को मुआवजा तक नहीं दिया।

वेदांता बॉयलर विस्फोट: इस बड़े हादसे के बाद प्रशासन ने जांच दल गठित कर औचक निरीक्षण तो शुरू किया, लेकिन कार्रवाई सिर्फ जुर्माने तक ही सीमित रही। आज तक किसी भी लापरवाह प्लांट का लाइसेंस निरस्त नहीं किया गया।

प्रशासन और औद्योगिक सुरक्षा विभाग की यह ढुलमुल कार्यप्रणाली साफ दर्शाती है कि उनके लिए गरीब मजदूरों की जान की कीमत महज कुछ रुपयों का जुर्माना है। जब तक प्रशासन कागजी लीपापोती छोड़कर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं करेगा और लापरवाह प्रबंधन को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजेगा, तब तक रायगढ़ के कारखानों में मजदूरों की बलि चढ़ती रहेगी।

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Amar Chouhan

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