विस्थापन नहीं, व्यवस्थित बसावट की मिसाल: अढ़ापारा का पुनर्वास मॉडल बना चर्चा का विषय! पेलमा…

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
अढ़ापारा (ओड़िशा)। औद्योगिक परियोजनाओं के कारण होने वाले विस्थापन को लेकर देशभर में अक्सर असंतोष और अव्यवस्था की तस्वीर सामने आती है, लेकिन ओड़िशा के अढ़ापारा गांव में इसका एक अलग ही उदाहरण देखने को मिलता है। यहां पुनर्वास को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सुनियोजित बसावट के रूप में लागू किया गया है।

एक सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता हाल ही में एक पारिवारिक वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान ओड़िशा थर्मल पावर कंपनी से प्रभावित परिवारों के लिए बसाए गए पुनर्वास गांव अढ़ापारा पहुंचे। यह वही स्थान है, जो कभी ओड़िशा के पूर्व विधायक प्रसन्न कुमार पंडा का निवास क्षेत्र रहा है। पंडा ब्रजराजनगर विधानसभा क्षेत्र से जुड़े रहे और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सक्रिय नेता के रूप में मजदूरों और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे।

अढ़ापारा में पुनर्वास की प्रक्रिया पारंपरिक कॉलोनी मॉडल से अलग दिखाई देती है। यहां प्रभावित परिवारों के लिए केवल मकान नहीं, बल्कि एक पूर्ण गांव बसाया गया है। प्रत्येक परिवार को इतना भूखंड दिया गया है, जिससे आने वाली कई पीढ़ियों की जरूरतें पूरी हो सकें। स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीन का आवंटन इस दृष्टि से किया गया कि परिवारों को भविष्य में विस्तार के लिए भी पर्याप्त स्थान मिल सके।

रोजगार के मोर्चे पर भी पहल उल्लेखनीय रही। प्रभावित परिवारों के एक-एक सदस्य को उनके कौशल या संबंधित ट्रेड के अनुरूप प्रशिक्षण देकर रोजगार उपलब्ध कराया गया। इससे विस्थापन के बाद आजीविका का संकट उत्पन्न नहीं हुआ, जो आमतौर पर ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती बनता है।

मूलभूत सुविधाओं के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। गांव में पेयजल व्यवस्था, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और बाजार जैसी आवश्यक संरचनाएं विकसित की गई हैं। इसके अलावा, लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में तालाब का निर्माण कर निस्तार और जल उपयोग की जरूरतों को भी पूरा किया गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां “पहले गांव बसाया गया, फिर पुराने गांव को हटाया गया”, जो पुनर्वास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील दृष्टिकोण को दर्शाता है।
अढ़ापारा का यह मॉडल उन क्षेत्रों के लिए एक संदर्भ बन सकता है, जहां औद्योगिक विकास और मानवीय पुनर्वास के बीच संतुलन बनाना चुनौती बना रहता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि पुनर्वास योजनाओं को इसी तरह समग्र दृष्टि से लागू किया जाए, तो विस्थापन की पीड़ा को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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