तमनार में विकास की दो तस्वीरें: 152 करोड़ का बाईपास, लेकिन जर्जर पुल पर टिकी जिंदगी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में इन दिनों विकास की एक विडंबनापूर्ण तस्वीर उभर कर सामने आ रही है। एक ओर जहां 152 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित बाईपास सड़क को क्षेत्र के लिए बड़ी सौगात बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर केशला पाट के पास स्थित पुराना पाझर पुल अपनी बदहाली के चलते किसी बड़े हादसे को आमंत्रण देता नजर आ रहा है।
यह वही पुल है, जिसका कुछ समय पहले प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने स्वयं निरीक्षण किया था। निरीक्षण के बाद उम्मीद जगी थी कि पुल की स्थिति में ठोस सुधार होगा, लेकिन हकीकत इससे उलट दिखाई देती है। विभाग ने हाल ही में महज 5 से 10 लाख रुपये खर्च कर मरम्मत का काम कराया, जो अब औपचारिकता से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो रहा।

इस पुल की स्थिति इतनी दयनीय है कि उस पर से गुजरते समय वाहन चालकों की सांसें थम जाती हैं। बावजूद इसके, रोजाना हजारों की संख्या में भारी मालवाहक गाड़ियां—खासतौर पर कोयला परिवहन में लगी डंफर—बिना किसी रोकटोक के इसी पुल से गुजर रही हैं। तमनार, जो औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका है, वहां अब बाइक और साइकिल से कहीं ज्यादा डंफरों की मौजूदगी दिखाई देती है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पुल के दोनों ओर लंबा जाम लग जाता है। भारी वाहनों की कतारें घंटों तक खड़ी रहती हैं, जिससे न केवल आमजन को परेशानी होती है, बल्कि आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही भी प्रभावित होती है। स्थानीय लोग लगातार इस बात की आशंका जता रहे हैं कि यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह पुल कभी भी ढह सकता है और एक बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है।

विकास की बड़ी घोषणाओं के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बुनियादी ढांचे की मौजूदा खामियों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ना सही रणनीति है? तमनार बाईपास निश्चित रूप से भविष्य के लिए राहत का रास्ता खोल सकता है, लेकिन वर्तमान में जिस पुल पर पूरा यातायात निर्भर है, उसकी अनदेखी किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराई जा सकती।
अब देखना यह है कि प्रशासन और जिम्मेदार विभाग इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं—क्योंकि यहां मामला सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की सुरक्षा का है।
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