‘डिजिटल अरेस्ट’ से APK जाल तक — रायगढ़ की ठगी ने साइबर अपराध का खतरनाक ट्रेंड उजागर किया (विथ वीडियो बाइट)

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ में साइबर अपराध का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने तकनीक के नाम पर फैल रहे भय के कारोबार को उजागर कर दिया है। खुद को सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताने वाले साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर विद्युत विभाग के एक सेवानिवृत्त परिवेक्षक से लगभग 37 लाख रुपये ठग लिए। मामला दर्ज होने के बाद पुलिस जांच में जुटी है, लेकिन यह घटना बताती है कि साइबर अपराध अब तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव और मोबाइल ऐप के जरिए संचालित हो रहा है।
घटना की शिकायत साइबर थाना में दर्ज कराई गई, जहां प्रारंभिक कार्रवाई के तहत लगभग दो लाख रुपये होल्ड भी कराए गए — जो समय पर रिपोर्टिंग की अहमियत को रेखांकित करता है।
डर की पटकथा — कॉल से वीडियो तक
पीड़ित को जनवरी में एक कॉल आया, जिसमें महिला ने खुद को टेलीकॉम नियामक संस्था से जुड़ा बताया और पहचान पत्र के दुरुपयोग का आरोप लगाया। इसके बाद कॉल को क्रमशः कथित टेलीकॉम अधिकारी, पुलिस अधिकारी और फिर केंद्रीय एजेंसी से जुड़े बताए गए व्यक्तियों तक ट्रांसफर किया गया।
यहीं से ‘डिजिटल अरेस्ट’ की कहानी शुरू हुई। वीडियो कॉल पर फर्जी अधिकारी ने गंभीर आर्थिक अपराध में फंसाने और गिरफ्तारी की चेतावनी दी। भय और भ्रम के माहौल में पीड़ित से बैंक खाते, संपत्ति और निवेश से जुड़ी जानकारी ली गई और जांच के नाम पर रकम ट्रांसफर करवाई गई। करीब दस दिनों में अलग-अलग खातों में लगभग 36.97 लाख रुपये भेज दिए गए।
एपीके फाइल का नया जाल
साइबर पुलिस का कहना है कि ऐसे मामलों में ठग अक्सर पीड़ित को एक लिंक भेजकर मोबाइल में एपीके (APK) फाइल डाउनलोड करने के लिए कहते हैं। इसे केवाईसी अपडेट, सिक्योरिटी ऐप या जांच ऐप बताकर इंस्टॉल कराया जाता है। ऐप इंस्टॉल होते ही मोबाइल की स्क्रीन, ओटीपी, बैंकिंग डेटा और रिमोट एक्सेस अपराधियों तक पहुंच जाता है। कई मामलों में पीड़ित को यह भी पता नहीं चलता कि उसका फोन नियंत्रित किया जा रहा है और इसी दौरान खातों से रकम निकल जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार प्ले स्टोर या आधिकारिक ऐप स्टोर के बाहर से कोई भी फाइल डाउनलोड करना सबसे बड़ा जोखिम है।
परिजनों को पता चला तो खुली ठगी की परत
परिजनों को जानकारी मिलने के बाद मामला स्पष्ट हुआ कि यह जांच नहीं बल्कि सुनियोजित साइबर ठगी थी। शिकायत साइबर थाना पहुंची तो तत्काल तकनीकी प्रक्रिया शुरू की गई और कुछ राशि होल्ड कराई जा सकी। पुलिस का कहना है कि यदि शिकायत और जल्दी आती तो बड़ी रकम बचाई जा सकती थी।
मामले में भारतीय न्याय संहिता और आईटी एक्ट की धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर बैंक खातों और डिजिटल साक्ष्यों की जांच की जा रही है।
साइबर अपराध का बदलता चेहरा
यह घटना उस नए ट्रेंड को दिखाती है जिसमें अपराधी केवल तकनीक नहीं, बल्कि मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर रहे हैं। सरकारी एजेंसियों का नाम, कानूनी शब्दावली, वीडियो कॉल की औपचारिकता, एपीके ऐप इंस्टॉल कराना और लगातार दबाव — इन सबका उद्देश्य पीड़ित को सोचने का समय न देना होता है।
डिजिटल अरेस्ट जैसा शब्द कानून में मौजूद नहीं है, लेकिन अपराधियों ने इसे डर पैदा करने के प्रभावी औजार में बदल दिया है।
पुलिस का स्पष्ट संदेश
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसी मोबाइल या वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करवाती है। किसी लिंक से ऐप डाउनलोड कराने या स्क्रीन शेयर करने के निर्देश मिलें तो तुरंत कॉल काट देना चाहिए।
नागरिकों से अपील की गई है कि बैंकिंग जानकारी साझा न करें, अनजान एपीके फाइल डाउनलोड न करें और संदिग्ध कॉल आने पर तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या नजदीकी साइबर थाना से संपर्क करें।
सबक — तकनीक से ज्यादा जरूरी सतर्कता
रायगढ़ की यह घटना बताती है कि साइबर अपराध अब केवल लिंक क्लिक करने की गलती से नहीं, बल्कि विश्वास, डर और मोबाइल एक्सेस के मिश्रण से हो रहा है। तकनीकी जागरूकता के साथ मानसिक सतर्कता भी उतनी ही जरूरी हो गई है।
डिजिटल दौर में सबसे बड़ा सुरक्षा कवच यही है —
फोन पर गिरफ्तारी नहीं होती, जांच के नाम पर पैसे नहीं मांगे जाते और आधिकारिक ऐप कभी एपीके फाइल भेजकर इंस्टॉल नहीं कराए जाते।