रेल लाइन पर मुआवजे की टकराहट — पुरानी दरों में अधिग्रहण, नई कीमतों ने बढ़ाया प्रभावितों का गुस्सा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले के गेजामुड़ा और आसपास के गांव इन दिनों रेल लाइन परियोजना को लेकर उबाल में हैं। उद्योग विभाग के माध्यम से बड़े भंडार क्षेत्र स्थित अडाणी पावर तक लगभग 30 किलोमीटर रेल लाइन बिछाने के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्षों पहले शुरू हुई थी। तब जमीन की गाइडलाइन दरें कम थीं और ग्रामीणों ने अनिच्छा के बावजूद मुआवजा स्वीकार कर लिया था। लेकिन अब जब राज्य सरकार ने नई गाइडलाइन दरें घोषित कीं और जमीनों की कीमतें कई गुना बढ़ गईं, तो वही अधिग्रहण विवाद का कारण बन गया है।
यह मामला केवल मुआवजे की राशि का नहीं, बल्कि समय, प्रक्रिया और भरोसे का भी है।
पुरानी अधिसूचना, नई हकीकत
रेल लाइन एक लीनियर प्रोजेक्ट है, जिसमें खेतों के छोटे-छोटे हिस्से अधिग्रहित होते हैं। इससे कई किसानों की जमीन दो हिस्सों में बंट गई, जिससे खेती की उपयोगिता भी प्रभावित हुई। अधिसूचना के समय लागू गाइडलाइन दरों के आधार पर अवार्ड पारित हुआ और भुगतान शुरू हुआ। उस समय ग्रामीणों के पास विकल्प सीमित थे।
लेकिन हाल ही में राज्य सरकार द्वारा गाइडलाइन दरों में भारी बढ़ोतरी के बाद तुलना सामने आई तो अंतर चौंकाने वाला था। जहां 2019-20 में मेन रोड किनारे जमीन की कीमत लगभग 12 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर के आसपास थी, वहीं नई दरों में यह 57 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई। अंदरूनी भूमि की कीमत भी कई गुना बढ़ी है।
यही अंतर आज विरोध की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।
एक एकड़ में लाखों का फर्क
एनएच किनारे की एक एकड़ भूमि का उदाहरण ग्रामीणों के तर्क को मजबूत करता है। नई दरों और सोलेशियम को जोड़कर मुआवजा करीब 90 लाख रुपये से अधिक बनता है, जबकि पुराने रेट से यही राशि लगभग 20 लाख के आसपास बैठती है। यानी एक एकड़ में करीब 70 लाख रुपये तक का अंतर।
ग्रामीणों का कहना है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया लंबी चली, लेकिन लाभ पुरानी दरों के हिसाब से तय कर दिया गया, जबकि बाजार मूल्य और सरकारी गाइडलाइन दोनों बदल चुके हैं।
धरना, तंबू और सवाल
गेजामुड़ा में प्रभावित परिवारों ने खेतों में तंबू डालकर धरना शुरू कर दिया है। प्रशासनिक टीम समझाइश में लगी है, लेकिन सहमति नहीं बन पाई है। विरोध का एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी है कि रेल लाइन का उपयोग निजी कंपनी के लिए होगा, तो अधिग्रहण को सरकारी परियोजना की तरह क्यों लागू किया गया।
यह सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि नीति से जुड़ा है — निजी उपयोग वाली आधारभूत संरचना के लिए सार्वजनिक शक्तियों का इस्तेमाल किस हद तक उचित है।
नीतिगत उलझन का क्लासिक उदाहरण
भूमि अधिग्रहण के मामलों में अक्सर यही स्थिति बनती है — प्रक्रिया पुराने नियमों में शुरू होती है और पूरा होने तक आर्थिक परिस्थितियां बदल जाती हैं। कानून अधिसूचना की तारीख को आधार मानता है, जबकि प्रभावित परिवार वर्तमान बाजार मूल्य को न्यायसंगत मानते हैं।
रेल लाइन परियोजना इसी टकराव का ताजा उदाहरण है। एक तरफ उद्योग और लॉजिस्टिक्स की जरूरत है, दूसरी तरफ ग्रामीणों की जमीन, आजीविका और न्याय की अपेक्षा।
आगे का रास्ता
यदि समाधान संवाद से नहीं निकला तो मामला न्यायालय या पुनर्मूल्यांकन की मांग तक जा सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी परियोजनाओं में “रिव्यू क्लॉज” या अंतर भरपाई की व्यवस्था भविष्य के विवाद कम कर सकती है।
फिलहाल गेजामुड़ा में सवाल साफ है —
जब जमीन की कीमत पांच गुना बढ़ चुकी है, तो मुआवजा पुरानी दरों से क्यों तय हो?
रेल लाइन की पटरियां बिछने से पहले भरोसे की दरार भरना प्रशासन और परियोजना दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।