जल-जंगल-जमीन पर घमासान: रायगढ़ के बरगढ़ खोला में वेदांता की खदान योजना के खिलाफ आदिवासियों का बिगुल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़। औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय संतुलन के बीच खिंची रस्साकशी में एक बार फिर रायगढ़ का वनांचल केंद्र में है। खरसिया विकासखंड के बरगढ़ खोला क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला उत्खनन को लेकर स्थानीय आदिवासी समुदाय खुलकर सामने आ गया है। ग्रामीणों ने रायगढ़ से सांसद राधेश्याम राठिया को ज्ञापन सौंपते हुए मांग की है कि वेदांता समूह की सहयोगी कंपनी भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (BALCO) को आवंटित कोल ब्लॉक तत्काल निरस्त किया जाए।
पांचवीं अनुसूची और पेसा का हवाला
ग्रामीणों का तर्क है कि यह पूरा इलाका संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां आदिवासी स्वशासन और परंपरागत अधिकारों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। उनका कहना है कि 8 अगस्त 2022 को छत्तीसगढ़ में प्रभावी किए गए पेसा (PESA) अधिनियम के तहत ग्राम सभा की सहमति के बिना प्राकृतिक संसाधनों पर कोई भी बड़ा निर्णय नहीं लिया जा सकता।
ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बरई कोल ब्लॉक के आवंटन की प्रक्रिया में ग्राम सभाओं की राय को दरकिनार किया गया है। “जल, जंगल और जमीन हमारे अस्तित्व का आधार हैं, इन्हें कागजी मंजूरी से नहीं छीना जा सकता,” एक ग्रामीण प्रतिनिधि ने कहा।


12 गांवों पर संकट की आशंका
बरगढ़ खोला वनांचल के 12 से अधिक गांव इस परियोजना की जद में बताए जा रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन शुरू होने पर विस्थापन, वन विनाश और जलस्रोतों के सूखने का खतरा पैदा होगा। मांद और बोरोई नदियों से घिरा यह इलाका जैव विविधता के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है।
स्थानीय समुदाय का कहना है कि यहां के देवस्थल, पूर्वजों की स्मृतियां और ‘बनगहियां’ बोली से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराएं खदान की धूल में दफन हो जाएंगी। “यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, पहचान और परंपरा का सवाल है,” ज्ञापन में दर्ज है।

औद्योगिक दबाव बनाम पर्यावरणीय सीमा
रायगढ़ लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। ऊर्जा और धातु क्षेत्र की कई इकाइयां यहां संचालित हैं। लेकिन अब ग्रामीण ‘केरिंग कैपेसिटी’ यानी पर्यावरणीय वहन क्षमता खत्म होने की बात कर रहे हैं। उनका आरोप है कि लगातार कोल ब्लॉकों के आवंटन से जिले का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ चुका है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, राज्य शासन और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) से भी हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि ज्ञापन देने के बावजूद कंपनियों की गतिविधियां जारी रहती हैं, जिससे लोगों में अविश्वास गहराता जा रहा है।

सांसद की भूमिका पर निगाहें
सांसद राधेश्याम राठिया को सौंपे गए ज्ञापन में परियोजना को निरस्त करने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर पहल की मांग की गई है। अब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि क्या जनप्रतिनिधि स्थानीय भावनाओं के अनुरूप कोई ठोस कदम उठाएंगे या औद्योगिक हित प्राथमिकता पाएंगे।
बरगढ़ खोला का यह विवाद केवल एक कोल ब्लॉक तक सीमित नहीं दिखता। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है जिसमें विकास की रफ्तार और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन साधना प्रशासन और राजनीति दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है।
फिलहाल, वनांचल की पगडंडियों से उठी यह आवाज संसद की दहलीज तक पहुंच चुकी है—अब देखना है कि इस पर निर्णय किस दिशा में जाता है।