बिजली सरप्लस राज्य में दर वृद्धि का विरोधाभास: छत्तीसगढ़ में घाटे की गुत्थी और पारदर्शिता की मांग- दीपक शर्मा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
छत्तीसगढ़ लंबे समय से देश के प्रमुख बिजली उत्पादक राज्यों में गिना जाता रहा है। कोयला भंडार, तापीय विद्युत संयंत्रों की श्रृंखला और अपेक्षाकृत कम उत्पादन लागत—ये सभी कारक इसे तथाकथित पावर सरप्लस राज्यों की श्रेणी में रखते हैं। ऐसे में जब हर वर्ष विद्युत दरों में वृद्धि का प्रस्ताव सामने आता है, तो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर घाटा पैदा कहां से हो रहा है?
उत्पादन नहीं, खरीद समझौते सवालों के घेरे में
ऊपरी तौर पर समस्या उत्पादन की कमी नहीं दिखती। राज्य के पास अपनी उत्पादन क्षमता है और कई निजी व सार्वजनिक संयंत्र यहां संचालित हैं। असली प्रश्न बिजली खरीद की शर्तों और अनुबंधों से जुड़ा है।
निजी कंपनियों से ऊंची दरों पर बिजली खरीद, टेक-ऑर-पे (Take or Pay) जैसे अनुबंध, जिनमें निर्धारित मात्रा की बिजली ली जाए या नहीं—भुगतान अनिवार्य होता है—और लागत निर्धारण की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, यही वे बिंदु हैं जिन पर विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं।
ऊर्जा अर्थशास्त्र से जुड़े जानकारों का तर्क है कि यदि राज्य की अपनी उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम है, तो फिर महंगी बिजली खरीद कर उसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालना किस तर्क से उचित ठहराया जा सकता है?
कानून क्या कहता है?
Electricity Act, 2003 के अनुसार टैरिफ निर्धारण में दक्षता, पारदर्शिता और उपभोक्ता हित सर्वोपरि होना चाहिए। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं किया जा सकता।
यदि बिजली उत्पादन, कोयला और भूमि जैसे संसाधन सार्वजनिक स्वामित्व में हैं, तो उनसे जुड़े निर्णय भी सार्वजनिक हित की कसौटी पर परखे जाने चाहिए। दर वृद्धि की मांग तभी न्यायोचित मानी जा सकती है जब उसकी लागत संरचना पूरी तरह खुली और सत्यापित हो।
दिल्ली का उदाहरण और विशेष ऑडिट
कुछ वर्ष पूर्व Delhi में बिजली वितरण कंपनियों के घाटे को लेकर बड़ा विवाद उठा था। उस समय स्वतंत्र विशेष ऑडिट कराया गया, जिसमें कई वित्तीय विसंगतियां सामने आईं।
उस अनुभव ने यह स्थापित किया कि जब तक खरीद समझौते, लागत निर्धारण और राजस्व गणना का निष्पक्ष ऑडिट न हो, तब तक घाटे के दावे पर आंख मूंदकर विश्वास करना कठिन है।
छत्तीसगढ़ में भी निजी बिजली खरीद समझौतों और दीर्घकालिक अनुबंधों की स्वतंत्र जांच की मांग इसी संदर्भ में उठ रही है। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही और पारदर्शी ऑडिट हो जाए, तो सरप्लस बिजली वाले राज्य में आम उपभोक्ताओं को 400 यूनिट तक मुफ्त या अत्यंत रियायती दर पर बिजली उपलब्ध कराना असंभव नहीं है।
रायगढ़ की दोहरी कीमत
Raigarh जैसे औद्योगिक और प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र की स्थिति इस बहस को और संवेदनशील बना देती है। यहां की जनता वर्षों से कोयला आधारित उद्योगों और तापीय संयंत्रों से उत्पन्न पर्यावरणीय प्रभाव झेल रही है—धूल, धुआं, जल स्रोतों पर दबाव और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां।
ऐसे में यदि स्थानीय नागरिकों पर ही महंगी बिजली का बोझ डाला जाए, तो यह सवाल और तीखा हो जाता है कि आखिर सार्वजनिक संसाधनों से संचालित उत्पादन का लाभ किसे मिल रहा है?
पारदर्शिता ही समाधान
ऊर्जा नीति केवल आर्थिक मसला नहीं है; यह सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा प्रश्न है। दर वृद्धि का प्रस्ताव रखना सरकार या नियामक आयोग का अधिकार है, लेकिन उसका औचित्य स्पष्ट करना भी उतना ही आवश्यक है।
आज जरूरत है—
निजी बिजली खरीद समझौतों की स्वतंत्र ऑडिट
टेक-ऑर-पे अनुबंधों की शर्तों की सार्वजनिक समीक्षा
लागत निर्धारण की पारदर्शी प्रक्रिया
उपभोक्ता हितों की प्राथमिकता
जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते, तब तक हर साल दर वृद्धि की मांग जनता के मन में अविश्वास को ही जन्म देगी।
छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन-संपन्न राज्य में ऊर्जा नीति का लक्ष्य केवल घाटा पाटना नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करना होना चाहिए। जनता सवाल पूछ रही है—और इन सवालों का जवाब आंकड़ों और पारदर्शिता से ही दिया जा सकता है।