मुआवजा, पुनर्वास और पेसा कानून को लेकर एनटीपीसी पर गंभीर सवाल, ग्रामीणों ने दी अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी (देखें वीडियो)

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
क़ानून के काग़ज़ों में उलझी ज़मीन, आंदोलन की दहलीज़ पर तिलाईपाली
रायगढ़/तमनार।
एनटीपीसी तिलाईपाली कोयला खनन परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। भूमि मुआवजा, पुनर्वास राशि और वैधानिक प्रक्रियाओं के पालन को लेकर प्रभावित गांवों के ग्रामीणों का सब्र जवाब देने लगा है। वर्षों से लंबित मांगों, अधूरे जवाबों और अस्पष्ट कार्रवाई से नाराज़ ग्रामीणों ने अब साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो वे शांतिपूर्ण लेकिन अनिश्चितकालीन आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
ग्रामीणों की ओर से एनटीपीसी परियोजना प्रमुख को दिए गए विस्तृत ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि माइनिंग परियोजना से प्रभावित आमवासियों द्वारा पहले भी व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से आवेदन दिए गए थे। इसके जवाब में एनटीपीसी द्वारा 02 दिसंबर 2025 को एक स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया, लेकिन उसका अध्ययन करने पर कई बिंदु न तो स्पष्ट पाए गए और न ही विधिक रूप से संतोषजनक।
मामले को सुलझाने के उद्देश्य से 09 जनवरी 2026 को एनटीपीसी और ग्रामीणों के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हुई, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि बैठक में उनके सवालों का ठोस जवाब देने के बजाय अधिकारी चर्चा अधूरी छोड़कर चले गए। इससे गांवों में असंतोष और अविश्वास का माहौल और गहरा गया।
ग्रामीणों ने यह भी याद दिलाया कि तृपक्षीय वार्ता की मांग को लेकर 10 अक्टूबर 2025 को एनटीपीसी को ज्ञापन दिया गया था। इसके बाद 14 नवंबर 2025 को रायगढ़ कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम घरघोड़ा और थाना प्रभारी घरघोड़ा को भी अवगत कराया गया। यहां तक कि 10 नवंबर 2025 को माननीय प्रधानमंत्री को भी पत्र भेजा गया, लेकिन आज तक न तो तृपक्षीय वार्ता हुई और न ही मांगों पर ठोस कार्रवाई।
ज्ञापन में प्रमुख रूप से भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013 के पालन की मांग की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि 2015 के अध्यादेश और कोयला मंत्रालय के 2017 के आदेशों के बावजूद मुआवजे का सही निर्धारण नहीं किया गया। आरटीआई से यह भी सामने आया कि एनटीपीसी ने अब तक मुआवजा पत्रक तक तैयार नहीं किया है, ऐसे में नए सिरे से गणना कर भुगतान किया जाना आवश्यक है।
मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि प्रभावित क्षेत्र अनुसूचित जनजाति बहुल और अनुसूचित क्षेत्र में आता है, जहां पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य है। ग्रामीणों का आरोप है कि तिलाईपाली, कुधरमौहा और रामपुर जैसे गांवों की ग्राम सभाओं से विधिवत अनापत्ति लिए बिना ही कार्य किया जा रहा है, जो कानून का सीधा उल्लंघन है।
इसके अलावा पुनर्वास नीति में 2006 को कट-ऑफ डेट मानने पर भी सवाल उठाए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खनन कार्य 2019 के बाद शुरू हुआ, ऐसे में युवा वर्ग और नए प्रभावित किसानों को पुनर्वास लाभ से वंचित करना अन्यायपूर्ण है। तेंदूपत्ता कार्डधारियों को प्रति कार्ड 5 लाख रुपये मुआवजा देने का जो आश्वासन पहले बैठकों में दिया गया था, उसके पूरा न होने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है।
ग्रामीणों ने यह आरोप भी लगाया है कि पूर्व में ली गई कई सहमतियां बिना जानकारी और कथित तौर पर फर्जी तरीके से ली गईं, जिन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। साथ ही जिन प्रभावित परिवारों को रोजगार नहीं मिला, उनके लिए वार्षिकी बेरोजगारी भत्ता देने की मांग भी दोहराई गई है।
अंत में ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि यदि अधिनियम 2013 और संवैधानिक प्रावधानों के तहत उनकी मांगों पर प्रमाणिक और संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती, तो वे संविधान के अनुच्छेद 19 और 300A के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए एनटीपीसी तिलाईपाली कोयला खनन परियोजना और उससे जुड़ी गतिविधियों का विरोध करेंगे। ऐसी किसी भी स्थिति की संपूर्ण जिम्मेदारी एनटीपीसी और प्रशासन की होगी।


तिलाईपाली में हालात जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उससे साफ है कि यह मुद्दा अब केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार, विश्वास और संवाद की विश्वसनीयता का बन चुका है। अब देखना यह है कि एनटीपीसी और प्रशासन समय रहते समाधान की राह चुनते हैं या आंदोलन की पटकथा खुद लिखने देते हैं।