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सूचना के अधिकार पर शिक्षा विभाग का मौन, पुसौर में RTI कानून की खुलेआम अनदेखी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)।
जिस शिक्षा विभाग से संविधान, कानून और नागरिक अधिकारों की समझ की अपेक्षा की जाती है, वही विभाग यदि सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना को ही नजरअंदाज करने लगे, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। रायगढ़ जिले के पुसौर विकासखंड शिक्षा विभाग का मामला कुछ ऐसा ही सामने आया है, जहां सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी आज तक आवेदक को उपलब्ध नहीं कराई गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सामाजिक कार्यकर्ता पद्मनाभ प्रधान द्वारा पुसौर विकासखंड शिक्षा विभाग से ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जानकारी मांगी गई थी। नियमानुसार समय-सीमा में जवाब नहीं मिलने पर प्रथम अपील, फिर द्वितीय अपील और अंततः शिकायत भी दर्ज की गई। विभाग को जानकारी उपलब्ध कराने की अंतिम तिथि 10 दिसंबर 2025 निर्धारित थी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो आज तक कोई सूचना दी गई, न ही विभाग की ओर से कोई औपचारिक संपर्क किया गया।

आवेदक का आरोप है कि संपर्क करने पर विकासखंड स्तर के जिम्मेदार अधिकारी द्वारा भी मामले को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। जिला स्तर के अधिकारियों से संवाद की बात तो दूर, निचले स्तर पर ही संवाद के दरवाजे बंद नजर आ रहे हैं। यह स्थिति तब है जब सूचना का अधिकार अधिनियम आम नागरिक को सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था।

विडंबना यह है कि सरकार द्वारा ऑनलाइन पोर्टल की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, ताकि आम नागरिक बिना किसी बाधा के सूचना प्राप्त कर सकें, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। पोर्टल पर न तो स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है, न ही आगे की प्रक्रिया को लेकर कोई मार्गदर्शन। शिकायत दर्ज होने के बावजूद जन सूचना अधिकारी की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई न होना विभागीय उदासीनता को उजागर करता है।

आवेदनकर्ता पद्मनाभ प्रधान

पद्मनाभ प्रधान का कहना है कि वे स्वयं सीमित संसाधनों और जानकारी के बावजूद कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आवेदन, अपील और शिकायत तक पहुंचे, लेकिन अब आगे की प्रक्रिया पोर्टल और विभागीय चुप्पी के कारण अंधेरे में है। सवाल यह उठता है कि यदि पढ़े-लिखे और जागरूक नागरिक ही इस व्यवस्था में भटकने को मजबूर हैं, तो आम ग्रामीण नागरिकों की स्थिति क्या होगी?

सूचना के अधिकार को लोकतंत्र की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन पुसौर विकासखंड शिक्षा विभाग का यह रवैया इस अधिकार को कमजोर करने जैसा प्रतीत होता है। यह मामला केवल एक व्यक्ति की सूचना मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, कानून के पालन और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

अब देखना यह है कि संबंधित उच्च अधिकारी इस गंभीर लापरवाही पर संज्ञान लेते हैं या फिर सूचना के अधिकार का यह मामला भी फाइलों और पोर्टल की भूल-भुलैया में ही गुम होकर रह जाएगा।

News associate PN Pradhan

Amar Chouhan

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